fbpx

Monthly Archive: August 2013

मज़ार की बयार

छत के अतरे
दुबकी बैठी पुरानी मज़ार….
उड़ा के
लिए जाती कौतूहल हज़ार….!!!

सैलाब की खामोशी
चुन्नट मे लपेटे….
उड़ती इर्द-गिर्द मीठी बयार….!!!

उम्मीद की ओढनी
कब तक थामेगी….
कभी तो
बाहर आएगी दबी चीखती पुकार….!!!

©खामोशियाँ-२०१३

2

धूप के जंगल


बांध के सब्र मे तुम…
ढूंढ लो गहराई भी….!!!
जिसमे उतार कर मैंने…
सुखाई हैं तनहाई भी…!!!

इन धूप के जंगलो से
बचाकर तराशा उसे…!!!
वरना कहाँ सरकती हैं…
आग मे पुरवाई भी…!!!

साथ उनके आने से
उठ पड़ी कब्रे…!!!
वरना कितने मुद्दतों से
पकड़ा था परछाई भी….!!!

©खामोशियाँ-२०१३

2

बूढ़ा धुआँ


एक अकेली चिगारी पर…
कुल्लियाँ करती उफनाती बटुली…!!


उसपे फूँक मारने तरसती बयार…
एक बूढ़ा उठता धुआँ…
चिमनी पर चढ़ के…
चाँद मे समा गया….!!

दौड़के उसके पीछे कैसे…
काला साया लिए निशा…
भीग गयी पसीने से…!!

©खामोशियाँ-२०१३
0

लम्हे की दास्ताँ

कुछ दूर चल….

गिरा पड़ा ….
वक़्त की कारवां से कट कर लम्हा….!!

सुना हैं ……
उम्मीद की धूप थोड़ी देर रहेगी…!!

हिम्मत हैं तो …..
चल परछाइयों के निशान पकड़े…!!

मिल जाएगा लश्कर….
दर्द से बोझिल हुई साँझ से पहले….!!

©खामोशियाँ

5
error: Content is protected !!