Monthly Archive: September 2013

धूप का चीलम:


अगर हो सके तो वो आलम बता दो….
जी ना सकते जिसके वो बालम बता दो…!!!


सूरज छुप रहा किसी पहाड़ की ओट मे…
आस की ढेबरी से वो चीलम जला दो….!!!

शरद ऋतु देख आ गई पट्टी बांध के….
नयन की जर्फ से वो झेलम हटा दो….!!!

लफ्ज दर लफ्ज ही रिस्ते रहते दर्द….
आस रूठने से पहले वो रेलम हटा दो….!!!

©खामोशियाँ
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चेहरा


चेहरे पर चेहरा सजाये बैठे हैं….
खुद मुखौटों मे उलझाए बैठे हैं….!!


चाँदनी कितनी चलती साथ…
ढेबरी पाकिटों मे छुपाए बैठे हैं…!!

आमवास अकेली पीछा करती…
जुगनू हाथो मे गढ़वाए बैठे हैं….!!

उम्मीद का साथ एक-दो कदम…
तकदीर खुद की बनवाए बैठे हैं…!!

©खामोशियाँ
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अजनबी मुखौटे


ट्रेन के पावदान भी गिनते
हर रोज़ सबके निशान…!!

चलते मचलते
हवाओं पर पेंग मारते…
हर हचको पर
अलार्म टाँगे
लोगो को जगाया करते…!!

कुछ धूधली तस्वीरों बाद
अक्सर दोहरा जाते चेहरे…!!!
मुखौटे भी गिने चुने
खुदा के पास भी…
तभी पहना देता
उन्हे एक अरसे बाद…!!

खोज ज़रा…
किसी अजनबी शहर मे
अजनबी बना के…
मिलेगा किसी
टूटी टीन की छप्पर तले
चाय की मीठे चुसकियाँ मारते…!!

पहचान ना पाएगा तू….
खुद के अक्स को भी….!!

©खामोशियाँ-२०१३

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किस्मत का खेल


रात अब तनहा कहाँ
चाँद जागता ना साथ…
पत्ते खेलने बैठते कि
सुबह चली आती ढ़ूढ़ने।


बेगम लापता….
बादशाह रूश्वा…
किसे मनाए क्या सुलझाए।

किस्मत का खेल
उम्मीदों से कोसों दूर।

©खामोशियाँ
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चाँद की बैकलाइट


चाँद की बैकलाइट मे
आज भी दिखते हैं….
तेरे प्रॉजेक्टर पर के उतरे हुए दिन….!!


स्वप्न मे भी कैकटस लगे पड़े….
हल्की सी अड़चन भी
पूरी तस्वीर बर्बाद कर देती….!!


©खामोशियाँ

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बूढ़ी लालटेन का नटखट बच्चा…


शाम को
सूरज के जाते जाते…
एक सांस मे गटक जाता
पूरी तेल का मटका…!!

उसकी जीभ पर
उभरे हर एक
फफोले साफ गिने जा रहे…!!

इतने गम
खुद पर लादे
हर पहर मटकता ही रहता…!!
एक बूढ़ी लालटेन का नटखट बच्चा…!!


©खामोशियाँ

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इतिहासी पन्ने


उस कायनात
की चमकती चाभी…
चांदी के छल्लो मे
उरसकर चली गयी….!!!
कितने
सैयारे लांघते पहुंचा…
पर दरवाज़ो को जकड़े
भूरी आँखों वाले ताले…
हर आहट पर
बड़ी आस से ताकते…!!
और उस रोज़ सोचता
एक रात
चुपके से क्यूँ ना फाड़ दूँ
तेरी जुदाई के
हर वो इतिहासी पन्ने…!!


©खामोशियाँ

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बदलते लिबास….!!

लोग कहाँ बदलते रुवाब बदल जाते….
पुराने जैकेट मे पड़े रुमाल बदल जाते…!!

लिबास छुपाए फिरते आजकल ए बशर…
सफ़ेद कुर्ते लगे गुलाब बदल जाते….!!

बड़ी शिद्दत से सोते पुरानी यादों मे …
आँखों से चिपके पड़े ख्वाब बदल जाते….!!

©खामोशियाँ

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झील

कितने जाल फैलाया….
……तारो को पकड़ने खातिर….

पर झील अकेली ठहरी….
……….कोई उतरा तक नहीं….!!!
शायद एक ढूढ़िया बटन….
……….फंसा गया काटें मे…..
फ़लक का कुर्ता फटा था
……….और चाँद भी गायब…..!!!
©खामोशियाँ
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डोरे डालता चाँद

एक जमाने से….
चाँद पीछे पड़ा मेरे…..
रात होते ही डोरे डालता….!!

कभी खिड़की से झाँकता….
तो कभी…
आगन पर टेक लगाए रहता….!!

आजकल
दिखता नहीं….
अमावस लिए गयी लगता….!!

महसूस
करता…ना चाहते
भी आँखें लिए जाता…!!

ऊपर फ़लक पर….
निशान हैं आज भी
चमकते उसके पाँव के….!!

©खामोशियाँ

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