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Monthly Archive: December 2013

कितने नववर्ष के सूर्य


रेलवे स्टेशनों की
…. धक्का-मुक्की में अड़े….


मोहब्बत की रेवड़ी-पैकेट थामें….
उसकी आँखों में…

जाने कितने नववर्ष के सूर्य
…. ढलते देखा है मैंने….!!!


©खामोशियाँ-२०१३

3

ज़िंदगी का नज़रिया


पल मे ही तो बदल लेती नज़रिया आकने का…..
वरना खूबसूरती की कबतक सागिर्द होगी मोहब्बत …..!!

रोज़ ही तो मिल जाते चेहरे नए “सिकन” ओढ़े….
वरना सादगी की इम्तिहान कबतक पास होगी फितरत….!!!

कुछ सीख ले वक़्त रहते तू भी इस ज़िंदगी से….
वरना ऐसे मे अकेले कबतक बहकी होगी शिद्दत….!!

कुछ लकीरें उधार हो जाते खुद-ब-खुद प्यार के…..
वरना मौत के चौराहे कबतक तड़पी होगी किस्मत….!!!

©खामोशियाँ-२०१३

3

एहसासों के “जनरल डायर”


हमे गुस्सा है उन लेखकों से जो अपने एहसासों की लहरें बस डायरी के सफ़ेद पन्नो मे उड़ेल कर अपने मेज़ के कोने मे झटक देते…..!!!

एहसास का भी उसमे पड़े पड़े दम घुटता जाता और वो मर जाते….सिमट जाते किसी कबोर्ड की धूल भरी आलमारी ताकते…..!!!

अगर आपके पास कुछ हैं वो उसे बाहर आने दे…..ब्लॉग को जरिया बनाए….

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But Please Don’t Strangle your emotions which are with you….Make them to burst a Fountain of Bliss to Bath everyone…..!!!

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कल देखा….
एक धूल भरी….
टूटी फूटी आलमारी मे दुबके….
एक पुरानी डायरी मे….
कुछ मरे पड़े थे अलफाज…..!!!


काफी दिन हो गए…..
मिल ना पाया था उनसे….
कुछ बुकमार्क
पकड़ निकाल लिए…..!!!


पर बाकी एहसास
मानो जालियावाला बाग मे फंसे….
एक दूजे के ऊपर….
गिरे पड़े …!!!


कुछ के सर
दूसरे के हाथो मे लटके मिले…..!!!


कुछ की टाँगो को
अफगानी बम से उड़ा डाले….
आखिर क्यूँ बन जाते हैं आप खुद
अपने एहसासों के “जनरल डायर”….???


©खामोशियाँ-२०१३

11

फ़लक की एक्सरे प्लेट

इस ठंड मे इतनी ओस पड़ रही कि दूर छोड़िए पास ही देख पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा….रेल से लेकर हवाई-जहाज सब मंद पड़ गए है…..और ज़रा सी तेज़ी सीधा हॉस्पिटल पहुंचा दे रही लोगों को….तो बस इसी परिपेक्ष मे हमने कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं ज़रा गौर कीजिएगा…..!!!


एक पूस की अंधेरी गुमनाम रात मे….
चारो तरफ धुंध की सिगरेट फूंकता…..
………………दौड़ा आ रहा था कि…..!!!

वक़्त के पहिये की
दाहिने हड्डी टूटी गयी…..
बूढ़े काका भी ढूढ़िया लालटेन थामे…..
……………..जांच रहे मर्ज…………!!!

बयार की स्ट्रेचर पर अब भी लेटा……
…………कराह से बिलबिला रहा…..!!!

अब देख कैसे कड़कड़ा रहे अब्र…..
फ़लक की चमकती भीगी……….
…..एक्सरे प्लेट पर उभरा है कुछ…..!!!

तारे जब आँसू पोछेंगे…..तो पता चलेगा…..
वक़्त तो…..
……….अभी लेटा बिस्तर पे मुंह लटकाए….!!!

©खामोशियाँ-२०१३

2

पैंतरे बदल गए

वादे तो वादे ही ठहरे आजकल के चाहे वो इंसानी हो या खुदा के….टस-से-मस ना होते….अढ़उल हो या अगरबत्ती मानने को तैयार नहीं…..उन्हे भी चाहिए….नए भगवान….नयी मिठाई….सब कुछ चाहिए एडवांसड….अपडेटड….पुराने पैंतरे से अब हल ना होगी समस्या….जितनी जटिल होगी समस्या उतना महंगा हो मेवा…..खैर अब कुछ पंक्तियाँ….!!!


चप्पलें घिस गयीं मंदिर जाते जाते….
आवाज़ें रिस गयीं अज़ान गाते गाते…..!!!

फरियादें ना हो सकी पूरी महीने बीते…..
उम्मीदें रूठ गयी मुकाम आते आते…..!!!

आखिरी तक लगाते गए बाज़ी हम भी….
यादें भी दांव चढ़ी अंजाम आते आते….!!!

पुरानी अक्स लिए तरस गयी ज़िंदगी….
तंग आ गए हमभी अंजान पाते पाते…..!!!

एक के एक बाद लोग छूटते गए ऐसे….
बदरंग हो गए साए वीरान आते आते…..!!!

©खामोशियाँ-२०१३

3

एहसास


फीलिंग भी आजकल बिजली के टिमटिमाते बल्ब जैसी हो गयी हैं अभी आती अभी चली जाती है…..हर फीलिंग अब तो शब्दो की खाल बन गयी है…..तेज़ भागते आज के दौर मे ज़रा सी समय की कमी है वरना लोग तो बिन बोले ही कितना ज्यादा समझा जाते….!!!हर एहसास को जरूरी नहीं की किसी भाषा के धागे मे पिरोया जाये….!!!

अक्स धुंधला गया…कसैली साँझ…
………..अचानक आ धमकी….!!!


पता ही न चला कैसे एकाएक…..
फूट पड़े सारे ज़री के गुब्बारे….!!!


और ढाँप लिया पूरे समुंदर को….
मानो परिचित हो………
…….जनम-जनम से एक दूजे से….!!!


©खामोशियाँ-२०१३

8

काठ के दुर्योधन


पाप-अधर्म…..लोभ-द्वेष…..
अक्सर मिला करते एक साथ….!!!
किसी गुमटी-नुक्कड़ पे….
पान खाते विभीषण से लिपटे…..!!

कासिम-जयचंदो से लदे….
भारत-वर्ष मे….
आज तो
कुरुक्षेत्र बैंचकर आ धमके
कितने चौराहे छेकाए शकुनि…..
पासे फेंके जा रहे…..!!!

कवच टूट चुका….
कुंडल रेपइरिंग-हाउस* मे….!!!
कर्ण पड़ा असहाय…..
नहीं देता वचन
टूटने का भय हैं….!!!

सुदर्शन पड़ा सुन्न….
उंगली घिस गई….
मदसूदन** भी मूक पड़े….!!!

बस कोई रोक लो….
वरना लूट खाएंगे…..
ये काठ के दुर्योधन…..!!!
*Repairing-House…….**श्री कृष्ण

©खामोशियाँ-२०१३  

5

एक बूढ़ी लकड़ी


एक बूढ़ी लकड़ी…..
लिपटे कितने जंजाल…..!!!

आखिर 
कुंडी के कानो मे 
कब तक फंसे रहेंगे…..!!!
जंग की चादर ओढ़े
बदकिस्मती ताले…..!!!

एक ही कमरे मे कैद…..
ना जाने कितने…..
यादों के गुच्छे…..!!!

कुछ तस्वीरें….
…..कुछ लकीरें…..
अनगिनत साँसे……
महफ़ूज आज भी उन्ही…..
दरीचों मे खोयी…..!!!

कबसे कानो का
एक ट्रांसमिटर*
छुपा रखा वहाँ….!!!

अब तो
दीवाल के रंग भी
पपड़ी छोड़ने लगे हैं…..
कौन कहता आएगा कोई…..!!!
*transmitter


©खामोशियाँ-२०१३

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