Monthly Archive: April 2014

कृतिम खूबसूरती

लपकती झपकती आँखें, उँगलियों से जुल्फे सुलझाती। ट्रेन की खिड़की लगे सीट पर बैठी बाला। लड़ रही अपनी लटों से, जो बार बार किसी जिद्दी बच्चे की तरह कानों की चाहदीवारी फांग बाहर निकल जा रहे।

सूरज किसी लफंगे मजनू की तरह खिड़की बदल-बदल के झाँका करता। जब जब वो सहेज कर हटती, तुरंत की किसी रेत की महल जैसे ढहा देता तेज़ी से आता झोंका। डूबते सूरज की लाल सतरंगी किरने आकर उसके बालो के रंगों को और उकेर देती। अभी ये सब कितना सुंदर चल रहा था कि अचानक से रात आ गयी। खिड़कियों पर शीशे के चद्दर ओढ़ा दिये गए, सटर गिर गए। 
अंदर की कृतिम रोशनी मे वो पहले जैसी कहाँ दिख रही थी। ट्रेन के पंखे भी उसके बालों को नहीं छेड़ रहे थे। मानो कोई घर का गार्जियन आ गया हो, और उसका बाहर घूमना फिरना बंद कर दिया हो। 
कुछ बातें जो प्रकृति ने बना के दी है उसमे इंसान आखिर किस हद तक फेर-बदल कर चुका है। बस इसी हरकत से वो भी हैरान परेशान है। आखिर हम होते कौन है इन सब पर बंदिश लगाने वाले। 
– मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)
4

टुन-टूना


बंदर के हाथ उस्तरा सुने थे, अब इंसानी हाथ मे टुन-टूना सुन लीजिये….कुछ दृश्य शेयर कर रहे। आजकल ये वाकये साथ हो रहे तो सोचा सचेत तो करू या जान तो लूँ और भी किसी के साथ ऐसा हो रहा।

दृश्य 1:
ट्रेन की लाइट बंद हो चुकी है। यात्री सोने की तैयारी मे है। अचानक देखते ही देखते रेल का पूरा का पूरा डिब्बा रंगबिरंगी जगमगाती रोशनी से नहा गया। मानो चलता फिरता मल्टीप्लेक्स बन चुका हो। ढ्रेन-ढ़ीशुम, धूम-धड़ाम तरह तरह की आवाज़ें आणि शुरू। लग रहा कोई फिल्म चली रही। इत्तिफाक़ ये भी होता की आप वो फिल्म देख चुके है। अब आपका मस्तिस्क पूरी छवि तैयार कर रहा। देख आप रहे नहीं पर सुन रहे और स्क्रीनप्ले आपके आगे चल रहा। अब आप स्लीपर हो या एसी नींद आने से रही, माना करेंगे तो झगड़ा/मार-पीट गाली-गलौज।

दृश्य 2:
बस पूरी खचा-खच भरी है। हिलना-डुलना तो दूर ठीक से खड़े रहना तक दुर्लभ। दफ्तर से बॉस का फोन आए जा रहा, जाने कौन सी बात करनी। दो बार फोन उठाने की जहमत की पर नतीजा कुछ सुनाई नहीं पड़ा, तो फोन काटनी पड़ी। पता नहीं कौन सज्जन के 5.1 चैनल के बूफर मे “रात को होगा हंगामा” चीख रहा। दूसरे कोने से किसी और गाने की आवाज़ सुनाई दे रही। तीसरा और दिग्गज वो अपने क्षेत्रीय भाषा के गाने भी उसी अंदाज़ मे सुने जा रहा। आपका भले ही उस गाने से लेना देना नहीं जानना-समझना नहीं पर भाईसाहब, ये तो सार्वजनिक सवारी है। झेलना तो पड़ेगा ही और अब बॉस से डांट भी फिक्स मानिए। फोन जो काटा आपने उनका इगो हर्ट किया।

दृश्य 3:
हॉस्पिटल आए है। आपका दोस्त पलंग पर लेटा दर्द से कराह रहा। उसे ऑपरेशन थिएटर मे लिए जाने के लिए बस चंद मिनट बचे हैं। बेचारा कुछ दर्द/कुछ उत्तेजना/कुछ डर के कारण सहमा जा रहा। अस्पताल के गलियारे मे फैली नीरवता है, होना भी चाहिए। तभी एक जगह जगह से फटी जीन्स से एक दुबले पतले लड़के ने अपनी ईट के आकार की चमकती मोबाइल निकाली और लग गया निंजा सोल्जर मे। ये निंजा सोल्जर की पिंग-पुंग पूरे हॉस्पिटल के माहौल को बर्बाद कर रही। वो आवाज़ इतनी असहनीय है की मेरा दोस्त बार बार उठ बैठ जा रहा।

दृश्य 4:
मैं काफी देर से “होटल क्लार्क अवध” मे अंकिता का इंतज़ार कर रहा। घड़ी की सुई थम सी गयी है मानो आधे घंटे का समय बीत ही नहीं रहा। चलो किसी तरह मैंने उसे काट लिया। अंकिता आ गयी। अब मैं उससे मेनू ऑर्डर के लिए दे रहा तो वो अपने सेलफोन मे इतनी बीजी है कि जैसे मुझसे बस मिलने आई हो और दिमाग अपने फोन मे लगाकर रख लिया हो। खैर हमने ऑर्डर तो कर दिया अब भी वो खाये जा रही और मुझसे एक शब्द बात नहीं की। मेरा खाना खत्म हो गया और उसने शुरू तक नहीं किया। फिर अचानक से उठी फिर कह रही “सोर्री राहुल आज खाने का मूड नहीं”। मन किया खींच कर दो थप्पड़ लगाऊँ उसे। फिर भी मैंने मज़ाक के लहजे मे पूछा कौन है फोन पर। सर हिलाते वो चली गयी।

क्या मोबाइल का आविस्कार इसलिए किया गया था।

मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

2

विश्व पृथ्वी दिवस (२२ अप्रैल)


बढ़ती गलती फटती धरती,
झुलस जाता उसका चेहरा,
विनाश की ओर है बढ़ती,
आह से व्याकुल वसुंधरा।

गोद मे उसके खेलते बच्चे,
सर पर रहता हरदम पहरा,
गर्दन काट अलग कर देते,
दर्द दे जाते बड़ा ही गहरा।

विनाश की ओर है बढ़ती,
आह से व्याकुल वसुंधरा।

निर्झरिणी बैठी नहला देती,
कपड़े भी धो देता है पोखरा,
शर्म ना आती हमे कभी,
कर देते उसको भी संकरा।

विनाश की ओर है बढ़ती,
आह से व्याकुल वसुंधरा।

पवन चलता सांसें चलाता,
दिनकर देतें है जो पहरा,
वायु को दूषित करके हम,
सूरज से मोल लेते खतरा।

विनाश की ओर है बढ़ती,
आह से व्याकुल वसुंधरा।

विश्व पृथ्वी दिवस (२२ अप्रैल)

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल

10

देश

राख़ खोई कस्ती को बदनाम होने दो,
साख खोई बस्ती को श्मशान होने दो।

कलई खुल जाती सब झूठे वादों की,
आदमी से आदमी की पहचान होने दो।

जुबान खुलेगी तो काट दी जाएगी,
पन्नो से पन्नो का समाधान होने दो।

एक ही छत तले बदल जाती फ़ाइलें,
कोनो से कोनो को सावधान होने दो।

बदल जाएंगे जीने के मायने बड़े जल्द,
अमीरों से अमीरों को परेशान होने दो।

शान से चलेगी इस देश की भी गाड़ी,
बहानो से बहानो का पूर्वानुमान होने दो।

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल

2

रोज़ की व्यथा


एक खचा-खच भागती लो-फ्लोर बस मे, तेज़ी से दौड़ते एक 60-65 के बुजुर्ग घुसे। साँसे अभी थमी नहीं थी कि नज़रें सीट तलाशने के काम मे जुट गयी। सीट कहाँ मिलती बस मे लोग पहले से ही खड़े थे।
बड़ी दूर देखा उन्होने कि ड्राईवर की सीट के पीछे वाली सीट पर एक लड़का बैठा है और उसको बाजू की सीट खाली है। पर शायद “किसी को वो सीट दिख ही नहीं रही थी” दादा ने यही सोचकर बहुत हिम्मत जुटाई और पूरी भींड़ चीरते हुए पहुँच गए।
बेटा “आप अगर अपना बैग हटा लो तो एक बूढ़ा आदमी बैठ जाए” चाचा ने बड़ी आस भरी निगाहों से उसकी तरफ देखकर बोला।
पर लड़का तो हैडफोन लगाए अपनी ही दुनिया मे था। उसे कुछ सुनाई ही नहीं दिया।
अबकी बार चाचा ने उसे झांकझोरते हुए बोला, “अरे बेटा ज़रा आप बैग हटा लो तो ये बूढ़ा भी बैठ जाए”
लड़का झल्ला गया, “देख बुड्ढे इस सीट पर अभी कोई आएगा और तू बूढ़ा है तो घर पे रह क्यूँ बस मे सफर करता है”। चाचा खिसियाते हुए वहाँ से हट गए, बुरा तो लगा था उन्हे पर क्या करे सब कोई उनके बस मे थोड़े है।
तब तक पीछे से आवाज़ आई, “काका आप आओ यहाँ बैठ जाओ मेरी सीट पर ये सहबजादे है उठेंगे नहीं”। काका ने नज़र घुमाई तो देखा, एक दुबला पतला युवक जिसका एक टांग नहीं था बैसाखी के सहारे उठा और खड़ा हुआ। चाचा ने माना किया, बेटा तुम कैसे खड़े….??
इतना कह कर रुक गए जैसे उन्होने आधी जुबान मुंह मे ही गटक ली हो। टेंशन ना लीजिये काका आप हमको कमजोर ना समझिए। आप आराम से बैठिए।
बस इतना सुनते ही चाचा की आंखे भर आई। वो बच्चे से कुछ बोले तो नहीं पर हाँ उनकी आंखे वो सारे आशीर्वाद दे देना चाहती थी उसको जिसके लिए प्रकृति भी गवाही नहीं देती।
– मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

10

कलम देखा है तुमने विरासत कहाँ देखी


कलम देखा है तुमने विरासत कहाँ देखी,
जख्म देखा है तुमने हिम्मत कहाँ देखी…!!!

बरस लगते मुखरे-मुकम्मल करने मे,
लफ्ज देखें है तुमने दिक्कत कहाँ देखी…!!!

जमाने भुला देते झूठी शान बिछाने मे,
भरम देखा है तुमने गफलत कहाँ देखी…!!!

हमने भी छोड़े है रईसी आशियाने तेरे,
रकम देखी है तुमने इज्ज़त कहाँ देखी…!!!

एक वजह खातिर ऐसे कैसे रूठ चली है…
कसम देखी है तुमने चाहत कहाँ देखी…!!!

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल

8

टेम्पररी आस्था


शरीर के खून चूसती गर्मी लिए आज फिर पहाड़ सा दिन खड़ा था। वही चटक धूप बालों के ऊपर से होकर गुज़र रही थी। बच्चे आखिरी सांस तक पूरा का पूरा सिलेबस गटकने के मूड मे थे। पर चेहरे काफी खिले हुए थे, हाव भाव से तो लग रहा था कि मैदान-ए-जंग के ताबूत मे बस आखिरी कील ठोकनी बाकी थी। हर जुबान पर बस यही था, “आज बस बचा ले भगवान…”। मन ही मन भगवान से डील भी करते कुछ जुबान पाए गए।

आज तो सभी आस्तिक थे। सभी मंदिरो, सभी मस्जिदों, सभी गुरद्वारों और शायाद गिरजाघरो से अपनी अपनी मन्नतें ले के जो आए थे। आज तो सौहार्द था, ना कोई हिन्दू ना कोई मुस्लिम….आज तो बस सभी भगवान के सच्चे सेवक थे। बड़ी बारीकी से पता किया तो मालूम चला आज बड़ा धमाकेदार पेपर है। लोग हौआ भी तो खूब बनाते पेपर से ठीक एक दिन पहले। कुछ तिकड़म-बाज़ पेपर उड़ाने के लिए रातों तक घूमते पाये जाते, तो कुछ अपने अंदाज़ से चपटेरो के हिस्सो को आने का दावा करते पाये जाते। सबको पता होता की ये सब फर्जी है नकली है, पर रिस्क कौन ले।

सुनील और विक्रम दोनों सेकंड इयर इलेक्ट्रॉनिक्स डिपार्टमेंट के बंदे। देखने मे बड़े सज्जन, पर क्लास मे इनसे बड़ा गुंडा कोई ना था। अरे पढ़वाइया जो थे। रोज क्लास करना, हर लैक्चर अटटेंड करना, समय पर काम पूरा रखना। अरे कभी कभी विक्रम सनडे तक आ जाता था, सुनील उसे खींच ले जाता था। साल भर जाने कौन सी पढ़ाई करते थे दोनों, पढ़ते भी थे या विलन बनाने आते थे रोज़।

आज तो पेपर का दिन था। उनके चेहरे पर भी खतरे की घंटी देखते विजय से रहा ना गया और बोल पड़ा, “अबे तुम लोग भी अभी तक पढ़ रहे, एक तो रोज़ आते हो, फिर भी कुछ बाकी ही रहता तेरा”
विक्रम-सुनील को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था जैसे। विजय जाओ, “भगवान के लिए हटो, आज वही बेड़ा पार कराएगा…ईएमएफ़टी जो है”
विजय पलटवार किया,”तू तो नास्तिक है, तो भगवान-भगवान कैसे जपने लगा…”
विक्रम बोला, “भाई दूसरों के चक्कर मे पंगा कौन ले, कहीं भगवान सच मे हुआ तो अपनी तो बैंड बजेगी ही ना”
विजय कुछ कहा नहीं वो मस्त-मौला था। सबको छेड़ता रहता, खींचता रहता बंदा।
दो टाइप के लोग मिलते एक्जाम के समय। पहले जो किताब पूरा छूए होते और दूसरे वो जो एकदम नहीं पढे होते। पहले ज्यादे परेशान रहते दूसरे तो जानते ही नहीं क्या आएगा।

चलो घंटी बज गई और सब अंदर प्रवेश कर लिए। 

सबके चेहरे के हाव-भाव एक जैसे, हसते-खुश होने की एक्टिंग करते चेहरे। खुद के ऊपर के दबाव को मन मे समेटते चेहरे। कुछ मज़ाक के बाद फिर ईश्वर की ओर आशा से देखते चेहरे। अंदर परीक्षा कक्ष मे गुसते हुए भी सहमे हुए है। परीक्षा शुरू हो गई पेपर देखते ही तोते उड़ गए लोगों के। कलम थम चुकी थी लोगों की,बस नज़रे चल रही थी। देख रही थी एक दूसरे को बड़ी लाचारी से। सबके चेहरे पर की नसें तनी हुई थी और चिंता की लकीरें बार बार ढेरों आकृतियाँ बनाती ही जा रही थी। आज घड़ी भी सुस्त पड़ी, और दिनो की तरह भाग नहीं रही थी। कभी कभी तो पेपर छूट जाता था टाइम की वजह से आज घड़ी भी रुक गयी लगता वो चिढ़ा रही हो।

विक्रम-सुनील जैसे कईयों की आज आस्था दांव पर लगती दिख रही थी। मन ही मन कितनी ख्याल आ रहे थे, पढ़ा भी था बजरंग बली को “छप्पन भोग” से आधा किलो लड्डू तक की भी डील तय हुई थी। फिर भी उन्हे तरस नहीं आया इस अनन्य से भक्त पर। जाने कितने बद्दे-बद्दे विचारो से बजरंगी समेत पूरे हिन्दू भगवानों की सत्य-निष्ठा संदिग्ध कर दी दोनों ने। परीक्षा भवन से निकलते ही ढेरो वादे किए सब ने अगली बार से पहले ही सब पढ़ लूँगा, आखिरी टाइम मे कुछ होता नहीं। भगवान भी साथ ना देता। 

ये बात सिर्फ विक्रम-सुनील की नहीं थी हजारो लोगों की थी, बस नाम अलग होते थे। 

पर फिरभी किसी तरफ अनाब-सनाब लिख कर लोगों ने पूरा किया पेपर। आखिर बाहर जो आजादी उनका इंतेजार कर रही थी। जहां वे बेफिक्र रात तक घूम सके, क्रिकेट मैच का पूरा लुत्फ उठा सके। जाने कितने दिनो से क्रीकइन्फो पर ही क्रिकेट देखते, वे खिलाड़ियों के लाइव एक्शन को जो तरस गए थे। कुछ के दो महीने के फिल्म का कोटा भी अभी तक पूरा नहीं हो पाया वो तो आज ही टोररेंट लगा के सोएँगे, ताकि सुबह तक डाउनलोड हो जाए। सब लग गए रम गए अपने पुराने ढर्रे मे भूल गए सारे वादे, जो कभी खुद से किए थे। आदमी एक्जाम से ठीक पहले जितना सच्चा हो जाता उतना अगर हर पल रहे तो परीक्षा कभी समस्या रहे ही क्यूँ। 

दो महीने बीते, अब रिज़ल्ट आने के दिन आ गए। रात के बारह बजे। फिर से पूरे हॉस्टल मे टेंशन का माहौल व्याप्त। और तो और इस दिन हॉस्टल का वाई-फाई जरूर नहीं काम करता। काम करता तो बस 2जी का धीमा कनैक्शन जो की सस्पेन्स बनाने की आग मे घी का काम करता। वैबसाइट खुल भी जाती तो करीब करीब दस बार करने पर किसी एक का रिज़ल्ट सुनाई देता, फिर चरचाए गरम हो जाती। बहरहाल थोड़े लोग तो ऐसे रहते, जो अपने रिज़ल्ट से पहले पड़ौसी का देख लेते। दो बातें उसमे भी होती पहली ये कि  शायद उन्हे एक साथ दर्द झेलने का दम ना होता या फिर दोनों फ़ेल होंगे तो दर्द बांटेंगे। 

सुबह चार बजे तक लगभग सबके दुखड़े हर लिए जाते। जो कभी पास होने की दुहाई दे रहा होता, वो रिज़ल्ट आते ही शेर बनके कम नंबर खातिर भगवान को कोसता। जो फ़ेल होते होते बचते, वो ये कह बच जाते की अभी तो तूने फ़ेल करा दिया होता रे भगवान। फ़ेल होने वाले तो सीधा जाके उन रुपयों का बैक-पेपर का फॉर्म भरते। मजबूरी है करे तो क्या घर बता सकते नहीं और पॉकेट मनी मे इतना उतार चढ़ाव घर के खातों मे दिख जाता। 

मतलब बजरंगी को लड्डू के बस वादे किए जाते और वो बेचारे खिसियाए अगले परीक्षा का फिर से इंतज़ार मे जुट जाते। वो भी सोचते अभी एडवांस देने वालो का ही काम करूंगा अन्यथा बयान से पलट जाते भक्त-गण। 

– मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

5

पृथ्वी गोल घूमती


एक बहुत बड़ी मूंछ वाले दादाजी….एक छोटी कद-काठी के अनुभवी चाचाजी….कुछ दौड़ते भागते नवयुवक….


सुबह-सुबह की बेला का ये मनोहर दृश्य देख मन भर जाता। हर दिन जैसे 24 घंटो बाद हम फिर निकल जाते। उन्ही कुछ अंजान चेहरो से मिलने, जिनसे मिलने का कभी हमने वादा नहीं किया फिरभी बड़ी बेसबरी से नजरें खोजती उन्हे। मानो हर 24 घंटो बाद पृथ्वी घूम के फिर वापस आ जाती। 


सबके चेहरे पर एक अजीब सी रौनक रहती। यही काम तो है जो हर कोई करता बिना भेद-भाव बिना रोक-टोक। चाहे वो अरब पति हो या सड़क का कूड़ा उठाने वाला। सुबह का उगता लाल सूरज घूस नहीं लेता, ना रात की ओट मे छुपा चाँद कभी अपना हिस्सा मांगता। वो तो दोनों को बराबर ही रोशनी/शीतलता देता।
पर आज वो बड़ी बहुत बड़ी मूंछ वाले दादाजी दिखे नहीं। शायद कोई उन्हे वृद्धाश्रम छोड़ आया होगा। ना ही चाचाजी ने अपने अनुभव बाटें आज। उन्हे भी कोई भतीजा जायदात की लालच मे खा गया होगा।

आखिर इन्ही 24 घंटो के बीच ही तो उन सड़को पर लगने लगती सपने सजाने की बोली और वही बोली सुबह के मसालेदार चाय के साथ हाथो मे लिए अखबार के किसी कोने से उठाकर हम पढ़ते। शायाद उसमे मूंछ वाले दादाजी.की फोटो ना हो पर होगा कोई उन जैसा ही। जिन्हे लिए हम केवल 20 सेकंड ही अफसोस जताते।
अब “न्यूटन चाचा” की भौतिकी समझ आई। हाँ पृथ्वी गोल ही घूमती, सारे के सारे चक्कर मे वही सब दिखते जो की किसी मेले झूले पे बैठे एक छोटे बच्चे को दिखते। जो पूरी भींड़ मे बस और बस अपनी माँ को निहारता रहता और खो जाने पर कस-कस के चिल्लाने लग जाता। आदमी भी तो बच्चा ही है पर वो अब रोता नहीं एहसासों के लिए ड्रॉपबॉक्स बनाया है उसने पर कभी उसे उड़ेलता नहीं।
– मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

0

बेमिसाल ज़िंदगी


बाल सफ़ेद….चेहरे पर कार्बन फ्रेम का मोटा चश्मा….बदन पर मटमैला रंग का कुर्ता….और कंधे पर भगवा झोला।
हाँ शायद यही थी कद-काठी उस पैसठ-सत्तर बरस के बुजुर्ग की। पर उनको बुजुर्ग कहना जरा गलत सा होगा उनकी दिनचर्या इतनी चुस्त-दुरुस्त थी की आज भी वो पाँच-सात किमी आसान से दौड़ जाते थे। उनके सामने अच्छे-अच्छे नवयुवक पानी भरते नजर आते थे। इतनी बड़ी ज़िंदगी, बड़ी कठिनाई से काटने के बावजूद उनके चेहरे पर शिकन ना होती थी।

पर अब इस उम्र के पड़ाव मे वो ज़रा एकांत चाहते थे। तभी भीड़ वाली दुनिया से दूर, सुबह-सुबह हर रोज़ निकल जाते किसी एकांत की तलाश मे। पर एकांत भी उनकी पहुँच से दूर ही भागता जाता। अभी मन की इसी उथल-पुथल मे रमे पाठक जी एक अंजाने से पार्क मे बैठे कुछ और ताना बुनने ही वाले थे कि पीछे से आवाज़ आ गयी।

अरे बाबाजी…प्रणाम…राय साहब ने बोला
जीते रहो…बेटा…पाठक जी का यही तकियाकलाम था। पर मौके की नज़ाकत को पकड़ते हुए, पाठक जी ने उन्हे और बोलने का मौका भी नहीं दिया।
बेटा ज़रा लेट हो गया अब चलता हूँ..पाठक जी ने बड़े नरम आवाज़ मे कहा…!!

महेश्वर पाठक अपने एरिया के महा विद्वान और पूजनीय व्यक्ति माने जाते थे। किसी के यहाँ कुछ कार-परोज हो तो सबसे पहले न्योता महेश्वर पाठक जी उर्फ “बाबाजी” को दिया जाता था। ऐसा नहीं था की बाबाजी लोगों को पसंद नहीं करते थे, पर कुछ उखड़े-उखड़े रहते थे। सारा जीवन जप-तक मे काटे महेश्वर पाठक के पास जमा पूंजी के नाम कुछ ना था। हाँ था तो बस “एक तेज़ जो उनके साथ चलता था, जिससे वो कितने भी भीड़ मे हो आसानी ने पहचान मे आ जाते थे”।


महेश्वर पाठक…शायद नाम ही काफी था मुहल्ले मे। लोग तो यहाँ तक की उनके घर के पते से अपने निवास स्थान को बतलाया करते थे। बाबाजी बड़े सुबह ही उठ नियमतः पूजा मे तल्लीन हो जाते थे। पर इतने जप-तप करते हुए भी पाठक जी कभी सुखी न रह पाए थे। जितने सुनियोजित बाबाजी थे, उतना ही पत्नी सुजाता भी कर्मठी थी। आखिर हो भी क्यूँ ना महेश्वर पाठक की पत्नी कहलाना भी कम गौरव की बात थोड़े थी। बाबाजी भी तो काफी ज़िम्मेदारी उन्हे सौंप दिया करते थे। 

भगवान के बेहद करीब माने जाने वाले बाबाजी चंद-मंत्रो के उच्चारण मात्र से बड़े-बड़ो के दुखड़े हर लेते थे। पर शायद ईश्वर से कभी भी बाबाजी की बनी ही नहीं। बड़े कम समय मे ही उनके माता-पिता का स्वर्गवास हो गया, ज़िंदगी के हर चट्टानों से दो-दो हाथ कर बाबाजी ने अपनी ज़िंदगी काटी। पर फिरभी ईश्वर को कभी दोष ना देते थे। बाबाजी का बेटा था अजय पाठक, था थोड़ा अंग्रेज़ियत वाला। उसे उनके काम मे जरा भी दिलचस्पी नहीं आती थी। बाबाजी के अपने काम मे इतने मगन रहना भी इसकी वजह हो सकती थी, वे घर वालो को समय नहीं दे पाते थे। अजय गुस्सा होता तो सुजाता से शिकायत करता था। हाँ, सुजाता एक कड़ी थी अजय और बाबाजी के बीच की। 

एक दिन अजय से रहा ना गया और बोला “माँ, आखिर ऐसे कब तक चलेगा!! आखिर पापा समझते क्यूँ नहीं इन सब से हम कब तक गुज़ारा कर पाएगे। ओह गोड…इट टू इरीटेटिंग। ये भजन-वजन आप गाओ। मेरे से ना होगा, और मुझे बाहर जाना है। 
सुजाता ने बहुत समझाया पर इस बार मसला गरमा गया। बाबाजी के कानो तक भी मामला पहुँच ही गया। उन्होने सुजाता को समझाया, “उसका अगर मन नहीं तो काहे जिद्द करतीं हैं आप, जाने दीजिये”। 
आखिर बेटे की ज़िद्द के आगे दोनों नतमस्तक हुए। अजय को अपनी सारी जमा पूंजी लगा कर बाहर भेज दिया। 

अब बाबाजी फिर से अपने धुन मे लग गए। पर सुजाता को रह-रह कर अजय की ही याद सताती। मन ही मन सोचा करती, “अकेला है और विदेश मे जाने कैसे कैसे लोग होते…कैसे रहेगा क्या खाएगा”। यही सब सोच सोच कर सुजाता गुमसुम सी रहने लगी। हर साल कलेंडर देखती और सोचती “बेटा आया नहीं ना ही कोई फोन किया”। पाँच साल बाद आखिर बेटे का वियोग उसे छोड़ा नहीं अचानक उसकी तबीयत खराब हुई, पता चला सुजाता को ब्रेन-ट्यूमर है। बाबाजी की अलौकिक शक्तियों का फिर से ईश्वर ने जमकर मज़ाक बनाया। सुजाता नहीं रही बाबाजी को अकेला छोड़कर। बाबाजी ने अजय को बुलवाने की हर संभव कोशिश की पर शायद, “उसे आना नहीं था…” पर बाबाजी हिम्मत नहीं हारे, पोटली उठाई और फिर से लग गए ईश्वर के भजन मे। लेकिन उन्हे आदत सी हो गयी थी सुजाता की, रह-रह वो फफक से पड़ते थे। 
पर लोग उन्हे थामते दिलासा देते, “बाबाजी आप ही तो हम सबके आदर्श हो और आप ऐसे करेंगे तो हम अपना दुखड़ा किससे रोएँगे”। 
लोग उन्हे भरोसा देते पर मन ही मन कोसते, हर तरफ एक ही जैसे, “बाबाजी के बेटे डॉ अजय पाठक की 
डिग्री किस काम की अगर वो अपने माताजी को ही नहीं बचा सका, ऐसे नालायक हो जाते है औलाद।”

बहरहाल बाबाजी ना समय को रोक सके ना दुख को। दोनों समानान्तर पटरियों की तरह उनसे बराबर दूरी पर ही रहते थे। काल-चक्र ने शायद बाबाजी को हार मनवाने की ठान ली थी, पर बाबाजी हर बार अपने चोटों को सहलाते उठ जाया करते थे। आखिर जो व्यक्तित्व उन्होने अपने इर्द-गिर्द बनाया था उसका फल मिलने के दिन आ रहे थे। नगर निगम के चुनाव के डंके बज गए, हर गली हर कूचे से प्रत्यासी अपने नामांकन भरने के लिए जोरों-शोरों पर थे। तभी उन्ही मे से किसी ने लहर उठा दी, क्यूँ ना बाबाजी को हम अपना प्रतिनिधि बना ले। मुहल्ले वालो मे तो सहमति बनते देर ना लगी। 
बस जो सबसे बड़ी बाधा थी वो अभी पार पानी बाकी थी। वो ये कि कौन जाके बाबाजी को मनाएगा चुनाव लड़ने के लिए और क्या बाबाजी मानेंगे या नहीं। खैर रात तक फैसला हो गया कि कल सब चलेंगे और बाबाजी को अपने बातों मे फंसा लेंगे। 
किसी तरह रात बीती, हर घरों मे यही चर्चे ज़ोरों पर थे, “बाबाजी मानेंगे या नहीं….”। शायद जितनी उत्सुकता एक बोर्ड एग्जाम वाले बच्चे को रिज़ल्ट आने से होती बस उसी तरह की मनोदशा पूरे मोहल्ले को घेर के रखी थी। लोग बाबाजी से एक एक कर मिले सबने कुछ ना कुछ दुखड़ा ही रोया। 
“बाबाजी अपने मुहल्ले के बल्ब देखिये कभी रात मे जलते नहीं, नेहा को रात मे कॉलेज से आने मे तकलीफ होती है” श्रीवास्तव जी ने कहा
अभी बाबाजी कुछ बोलते तभी सोनू बढ़ई आ गया, “बाबा ये देखो ना पूरा सड़क कैसा हो गया है, कल मैं अपने समान को पहुंचाने जा रहा था कि गाड़ी गड्डे मे गिरी और सामान चकनाचूर हो गया”
बाबाजी को कुछ समझ नहीं आ रहा था, लोग क्या बोलना चाह रहे थे, बाबाजी अचानक से बोल पड़े सोनू बेटा और अनिल बाबूजी आप जाके सभासद से कहिए ना हम कैसे करेंगे ये सब। आपके दुखड़े हरने के लिए मेरे पास तो पैसे भी नहीं, बाकी बचे भगवान वो तो हमसे रूठे ही रहते। 
इतना कहते ही सभी एक साथ बोल पड़े, “बाबाजी आपसे भगवान रूठे कहाँ, हम सब हैं नहीं और आप खड़े होइए चुनाव मे लोग आपको चाहते भी हैं। ” बाबाजी माना करते जा रहे थे पर लोग अड़े पड़े थे और हाँ बाबाजी को अपनी हठ छोडनी पड़ी। 
बाबाजी को नामांकन भरता देख सभी मुहल्ले के लोगो ने जोरदार स्वागत किया। 
इतिहास रच दिया… हाँ इतिहास रच दिया….
बाबाजी निर्विरोध चुने गए हाँ किसी ने नामांकन ही नहीं भरा। लोगों के इस जबर्दस्त उत्साह से बाबाजी के जीवन मे नयी स्फूर्ति का संचार हुआ और वे दुगने उत्साह से अपने कार्य-क्षेत्र मे लग गए। देखते ही देखते उन्होने मुहल्ले मे मंदिर कि स्थापना करवा दी। सड़क, नाली, लैम्प सही करा दी। 
और बस ऊपर सर करके भगवान को धन्यवाद किया। फिर मन ही मन कहा अब कोई नेहा कोई तंग नहीं करेगा ना ही किसी सोनू की गाड़ी गड्डे मे गिरेगी। आज सुजाता तू होती तो देखती इन लोगो ने तो हमे देवता बना दिया। उन्होने मे मन ही मन बोला, ” अजय तूने देखा लोगों ने हमे कितना प्यार दिया”
ईश्वर बस इतनी सी और कृपा करना घमंड, ईर्ष्या से दूर रखना। बस लोगों की सेवा मे मेरा दिन बीते इनती सी शक्ति देते रहना

– मिश्रा राहुल
(लेखक एवं ब्लोगिस्ट)

6

अखबार


खूनी धब्बे सानते है अखबार रोज़,
खुदा छुपके रोता है लाचार रोज़…!!!

पन्ने पलटने का मन ना होता,
बनकर टूट जाते है विचार रोज़…!!!

सड़ते घावो को ध्यान कौन देता,
मायूसी से झाँकता है उपचार रोज़….!!!

शकुनि के पासों मे उलझ ही जाता,
दुर्योधन से भागता है प्रतिकार रोज़….!!!

तम के कुशाशन पर ध्यान कौन देता,
जेबें वजने तौलता है बहिष्कार रोज़….!!!

©खामोशियाँ-२०१४

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