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Monthly Archive: October 2014

तजुर्बा

जीने का नया तजुर्बा सिखाता गया,
साथ चलकर रास्ता दिखाता गया…!!

अड़चने थी कितनी सफर में लिपटी,
रात रुककर दांस्ता सुनाता गया….!!

नज़्म जुबान से उतार कर देखता,
हाथ पकड़े रहता लिखाता गया…!!

लत लग गयी खूब बातें बनाने की,
चुप रहकर रिश्ता बनाता गया….!!!

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(३०-अक्तूबर-२०१४)(डायरी के पन्नो में)

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आवाज़

आवाज़ जो है अगर तो बोलो भी,
दिल में ना रखो जुबान खोलो भी।

वक़्त जब बस में नहीं तो क्या करे,
जाम की भट्टी से जहान तौलो भी।

मुकद्दर ज़िंदगी की चाभी छोड़ा,
जेब से निकाल अरमान खोलो भी।

यादों के गुलदस्ते तो मोती गिराते;
धागे में डालकर वादे पिरोलो भी।

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(२९-अक्तूबर-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

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नाकाम

नाकाम हो जाए गर तो क्या करे,
वक़्त जोड़ दें या फिर शिकवा करे।

कशिश तो रहती हर बातों में ऐसी,
दिल रोक लें या फिर चलता करे।

वजूद भी घिसटता है दर-बदर ऐसे,
रिश्ते मोड दें या फिर बहका करे।

आदत पड़ी है तो बदल कैसे पाएगी,
आँखें खोल दें या फिर चहका करे।

ढूंढने पर खुदा में भी कमी मिलेगी,
आज छोड़ दें या फिर झगड़ा करे।

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(२९-अक्तूबर-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

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यादों की सिनेमैटोग्राफी

कभी कभी…
मन होता है…
यादों की स्क्रीनप्ले…
निकाल कैद कर लूँ….!!

सारे के सारे
एहसासों को डाइलॉग
देकर रेकॉर्ड करा लूँ…!!

एक एक क्लिप…
एक एक सांस जैसी…
ताज़ी है अभी भी जेहन में…!!

कभी कार्बन…
रखों तो जरूर…
छप जाएंगे सारे अल्फ़ाज़…!!

ढेरों गपशप के
इर्द-गिर्द चलती….
खुशनुमार सिनेमैटोग्राफी….!!

चेहरों पर
लिपटे इमोशन..
ढेरों कमेरा एंगल…
खुद-ब-खुद ही
तैयार करते जाते…!!

सुनहरे
लम्हों को बार बार
देखने का जी करता…!!

आखिर
कोई करता…
क्यूँ नहीं इन
खूबसूरत लम्हों की एडिटिंग…!!

©खामोशियाँ-2014//मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से)(25-अक्तूबर-2014)

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आजकल

अपने ही को देखकर वो शर्माने लगे है,
आईने भी आजकल नज़र छुपाने लगे है।

आँखों की खेतों में कितने ख्वाब उगते,
दिल की डाली पर फूल मुस्काने लगे है।

वादों की पोटली यादों से ही भरती जाती,
साये उजालों के दामन से लगाने लगे है।

कहना तो रहता कितना कुछ एक बार में,
जुबां खामोश रहते इशारे समझाने लगे हैं।

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से)(२४-अक्तूबर-२०१४)

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धोखा

नकाब…फरेब…
धोखा…साजिश…!!

सुबह उठो तो
बारिश का धोखा,
चमकती रात में
अमावस का धोखा…!!

अकेले पहिये पर
घिसटता इंसान,
जिसको मिलता
कंकड़ का धोखा…!!

बसंत खड़ी पास
फिर भी मिलता,
अक्सर गुलों के
बिखरने का धोखा…!!

सुख के वक़्त में
मिला दर्द का धोखा,
जीत की स्वाद में
रहता हार का धोखा…!!

ज़िंदगी क्या है ??
साजिश या धोखा ??
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©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(१७-अक्तूबर-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

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रूबिक्स क्यूब

ज़िंदगी
रूबिक्स क्यूब
जैसी घूमती रहती।

लाल के इर्द गिर्द,
हरे रिश्ते उलझे रहते।

सफ़ेद शांत छुपा,
अकेले बैठा रहता।

पीला जिद्दी ठहरा,
नीले का पीछा करता।

जितना
सुलझाना चाहो,
उतना उलझती जाती।

अपने कुछ पास आते,
तो दूसरे उसे बिगाड़ देते।

– मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

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जन्नत

नज़रों में कैसा इशारा हो गया,
दिल मेरा कहाँ तुम्हारा हो गया।

पलट कर खोजते तुझे रास्तों में,
मेरा मन आज आवारा हो गया।

जुगनू चुराता रहा रंगीन रातों से,
अंधेरों में वहाँ सितारा हो गया।

सपनों में देखा था जन्नत जैसा,
प्यारा एक जहाँ हमारा हो गया।

मुकद्दर आया खुद पास चलके,
रूठता था कभी बेचारा हो गया।

डूबते रहा था जहाज भी दरिया में,
मन्नत से आज किनारा हो गया।
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©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से)(०७-अक्तूबर-२०१४)

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