Monthly Archive: January 2015

फासला


कभी तुझमें तो कभी मुझमें पलता है,
ये फासला भी तो कुछ ऐसा चलता हैं।

दूरियाँ वजह होती नहीं दूर होने की,
एहसास मन का कुछ ऐसा बोलता है।

ओढ़ता हूँ तो पाता बहुत करीब मेरे,
दिल के पास कोना ऐसा मिलता है।

बस एक तू ही तो जो रूबरू है मुझसे,
वरना हमसे जमाना ऐसा जलता है।

©खामोशियाँ-२०१५ | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (२५-जनवरी-२०१५)

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बालकनी पे चाँद

यादों की छांव के गुल खिलते रहेंगे,
चाँद बालकनी पे रोज़ मिलते रहेंगे।

वक़्त चलता रहता है रुकता कहाँ,
ख्वाइशों के बाल रोज़ उड़ते रहेंगे।

ज़िंदगी मुट्ठी भर धूप लिए घूमती,
मोम के बाजू हर रोज़ जलते रहेंगे।

चेहरे बदल कर आजमाया करती,
साँचे ख्वाबों के रोज़ खुलते रहेंगे।

©खामोशियाँ-२०१५ | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (२५-जनवरी-२०१५)

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ज़िंदगी की नाव

चलें आज
ज़िंदगी के भंवर में
यादों की नाव उतारे।

उदास
लम्हों को
बीच से फ़ोल्ड* करे।

टूटे
ख्वाबों को खुद
अटैच* कर पास लाए।

अपने
वादों को
ऊपर खुद चढ़ा आए।

बस
वादों को
लम्हों में
अल्टी-पलटी करे।

ज़रा सा
खोल दें बाहें
तैयार खड़ी आपकी नाव।

चलें आज
ज़िंदगी के भंवर में
यादों की नाव उतारे।
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ज़िंदगी की नाव | मिश्रा राहुल
©खामोशियाँ-२०१५ | १७-जनवरी-२०१५

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पुरानी नज़्म

कोई पुरानी
नज़्म उठा लूँ…
या नई
गज़ल लिख दूँ…!!

फिर
काले गुब्बारे
पे नक्काशी करूँ,
या नए
सैन्यारे खरीद लाऊं…!!

फिर
उम्मीदों की
एक धूप खोजूँ…
या नए
नज़ारे ढूंढ ले आऊँ…!!

फिर
पॉकेट से
कोई जुगनू निकालूँ,
या नए
सितारे खोज ले आऊँ…!!

बता ज़िंदगी
कोई पुरानी
नज़्म उठा लूँ…
या नई
गज़ल लिख दूँ…!!

©खामोशियाँ-२०१५ // मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (८-जनवरी-२०१५)

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एखट-दुक्खट

कभी
आ ज़िंदगी
एखट-दुक्खट खेलें।

खांचे खींचे,
पहला पूरा,
दूसरा आधे
पर कटा हुआ।

आता है ना??
तुझे पूरा
खांचा खींचना।

गोटी फेंकें
बढ़ाएँ चाल।
चल जीतें
घर बनाए ।

अपने
घर में
आराम से रुकें
सुकून पाए।

फिर
जल्दी निकल दूसरे
के पाले फांग जाए।

कभी
आ ज़िंदगी फिर से
एखट-दुक्खट खेलें।

©खामोशियाँ-२०१४॥ मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (०४-जनवरी-२०१५)

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