Monthly Archive: September 2015

लप्रेक ६

दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय के ठीक सामने। दो अंजान गलियों से अचानक दो बिलकुल सफ़ेद रंग की ऐक्टीवा अर्ध-वृत्त बनाते हुए सरल रेखा में आ गयी। साथ ही नज़रें भी सामने से हटकर क्षैतिज पटल पर जम गयी।

सुरुचि तुम और गोरखपुर में – हाँ राजीव मैं वो भी गोरखपुर में। मेरा एसएससी का सेंटर यहीं आया। एडमिट कार्ड स्कूटी के डिग्गी से निकालते अपना नंबर ढूंढने लगी। लाओ राजीव एडमिट कार्ड तुम्हारा देख लूँ। उनसे झट से अपने शर्ट में छुपाते बोला, ओह वो तो घर भूल गया। आदत तुम्हारी बदल सकती है?? कुछ आदतें बदलने के लिए नहीं होती।

ठहाके लगाते दो जुड़वा स्कूटी में से एक लापता हो गयी। राजीव नें फोटोकॉपी दुकान पर गाड़ी धीमी की। यहाँ पर मूवी दिखाओगे सुरुचि बोल पड़ी, पता है तुम्हारे पास है एडमिट कार्ड। कुछ आदतें अपनी ऐसी ही रखना उम्र भर। गाड़ी का एक्सलरेटर तेज हो गया जा पहुंचा माया सिनेप्लेक्स।

©खामोशियाँ-2015 | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (21-सितंबर-2015)

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लप्रेक ५



घड़ी में तीन बजे नहीं की रास्ता निहारना शुरू। बैंक रोड पर बारिश कुछ ज्यादा ही हो रही थी। लड़के की छप्पर भी टप-टप-टप। देखने के चक्कर में उसने कई ग्राहकों पर ध्यान तक नहीं दिया। उसने बस रुवांसा मुंह बनाया ही था कि ठेले पर लगे बताशों के ढ़ेर के पीछे से आकर एक बाला नें हाथ बढ़ाया।


क्लचर खोलकर उसने बालों को ऐसा झटका मारा जैसे मानो रजनीगंधा की खुशबू पूरे पांचों फ्लेवर को एक ही बना दिया।

पहले पुदीना फिर सौंफ फिर हींग। पहाड़े की तरह याद कर रखा है। हर दो पुदीने के बताशों के बीच एक मीठा मज़ा। काफी पुरानी यारी सी लगती।

प्यार तो प्यार है एक अधिक बताशे या दों के बीच एक मीठा खिलाने से भी हो जाता।

– मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)
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