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Monthly Archive: January 2016

प्रेम में इस्तेहार

प्रेम में इस्तेहार बन बैठे हैं हम,
भोर के अखबार बन बैठे है हम।

सब पढ़ते चाय की चुस्की लेकर,
हसरतों के औज़ार बन बैठे हैं हम।

सुर्खियां जलकर ख़ाक हो गयी,
सोच के गुलज़ार बन बैठे है हम।

बदलता जाता नक़ाब हर घड़ी,
काठ के पतवार बन बैठे हैं हम।

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चित्रकारी Vs कलमकारी।

एक
जैसी लगती
तेरी चित्रकारी
और मेरी
कलमकारी।

लिखता
हूं तो एहसास
कैनवास हो जाता।
अल्फ़ाज़
मेरी कूंची बन जाती।

क्यूँ ना
कभी ऐसा हो,
तेरी स्केचिंग
के कैनवास पर,

मैं शब्दों के
गौहर सजा दूं।
और तू मेरी
ग़ज़ल पर
अपने रंगो का
टीका कर दे।

– मिश्रा राहुल

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कार्बन


एक
कार्बन रखकर

एहसासों को
गाढ़ा कर,

कुछ
सफ़ेद पन्ने पे
उभरेंगी तारीखें।

नज़र
का टीका
करके गोला मार देना।
आजकल
जमाना खराब है।

– मिश्रा राहुल

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