Monthly Archive: June 2016

लप्रेक १३

जानती हो श्रेया हेडफोन का बायाँ शिरा तुम्हारी कानों में क्यों लगाता ? गानों की इमोशनल बातें बाए कानो तक जल्दी पहुँचती।

“अच्छा जनाब, फिर दाहिने कानो का कॉन्सेप्ट समझाइये” श्रेया नें पूछा

मेरा हेडफोन का दाहिना शिरा खराब है। गानों की लब्ज़ों को तुम्हारे होंठों से टटोलकर, तुममें खो जाता हूँ।

फिर तीन शब्दों को चार शब्दों में बनाकर बातें ख़त्म हो गयी और गानों की धुन में माहौल सराबोर हो गया।

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लप्रेक १२

एनफील्ड की पिछली सीट पर बैठी दिव्या पिछले दस मिनट से बोले जा रही थी। कुछ रेस्पॉन्स ना आता देख उसनें खीजते हुए कहा, “या तो अपनी ये फटफटी बेंच दो या मेरे साथ पैदल चला करो। दोहराने में फिर से वही इमोशन नहीं ला पाती मैं।”

रिशब नें मुस्कुराते कहा, “याद है इसी एनफील्ड पर तुम्हे सबसे पहले बेतियाहाता की चमचमाती सड़कों पर घुमाया था। फिर भी लाख बात की एक बात होती तुम्हारी।

अगले दिन रिशब नें पहली बार दिव्या के घर पहुचकर कॉल किया।
रिशब नें कहा, “हेल्लो दिव्या बहार आओ मैं आ गया”।
दिव्या बाहर आते ही, दंग रह गयी।
सामने खड़ी थी सफ़ेद चमचमाती होंडा एक्टिवा।
रिशब नें मुस्कुराते कहा,”एनफील्ड थी बस दिव्या थोड़े थी।”

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लप्रेक ११


धूधली सी शाम में श्याम के कंधों पर सर रखकर बैठी थी। काफी देर तक की खामोशी को चीरते हुए। नीतू नें आसमान में आकृति दिखाते हुए कहा चलो न उस बादल के पीछे चले। एक बादल से दूसरे पर आइस-पाइस खेलेंगे। 

तुम सूरज ओढ़ लेना मैं चाँद पॉकेट में छुपा लूँगी। फिर अदला बदली करेंगे दोनों का। ले जाऊँगी बहुत दूर मेरी नानी के गाँव में ये चाँद गड्ढे में छुपा दूँगी। फिर चाँद दिन पूरी करने ना आएगा। और मैं तुम्हारे साथ यहीं पूरे एक दिन एक सौ बरस जैसे गुज़ार दूँगी।

– मिश्रा राहुल

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लप्रेक १०

रेनॉल्ड्स 045 अब तो सफ़ेद से पीला पड़ गया हैं। करन नें उसकी नीली कैप भी बड़ी सम्हाल के रखी। पिछले बार आशीष से उसकी कट्टी भी इसी बात पर हुई थी। उसनें एक दिन के लिए पेन उधार मांगी थी। 

करन से दिल पे पत्थर रखकर उसे एक दिन खातिर अपना रेनॉल्ड्स 045 दिया था।
 

आजकल दूकान दूकान ढूंढता है, रिफिल मिलती नहीं। लोग मजाक भी
उड़ाते अमन बदल दे अपनी राम प्यारी।
 

अमन भी पलटवार करता। गिफ्ट कभी पुराना होता है क्या। कभी प्यार करोगे समझ जाओगे हुजूर।
 

– मिश्रा राहुल

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लप्रेक ९

जैसे ही कार का दरवाजा बंद होता। अंगूठे और दोनों उंगलियां सीधा म्यूजिक की वॉल्यूम नॉब ही घुमाती।

आवाज़ धीरे धीरे तेज़ होती की कैसेट को फ़ास्ट फारवर्ड लगा दिया जाता। अक्सर दोनों में इसी को लेकर लड़ाई होती थी कि उसने जो पसंद के गाने पर्ची में नोट करवाये थे वो क्यों नहीं भरवाये हमने।

आजकल ड्राइव करता हूँ अकेले, बगल की सीट पर लोग बदलते जाते। आजकल साइड ए ही लगा रहता। न कोई छेड़ता ना कोई पलटता। बजता रहता फिर खुद ही बंद हो जाता या शायद मैं ख्वाब से वापस लौट आता।

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