Monthly Archive: December 2017

इस्तेहार

प्रेम में इश्तेहार बन बैठे हैं हम,
भोर के अखबार बन बैठे है हम।

सब पढ़ते चाय की चुस्की लेकर,
हसरतों के औज़ार बन बैठे हैं हम।

कितनी सुर्खियां जलकर ख़ाक हुई,
सोच कर यलगार बन बैठे है हम।

बदल जाता मुसाफिर हर सफर में,
काठ के पतवार बन बैठे हैं हम।

– खामोशियाँ
(17-दिसंबर-2016)

8

अरमान

यूँ राख हुआ था अरमान जलते ही,
कोई मिल गया था मुझे निकलते ही।

लोगों के पॉकेट की तलाशी लीजिये,
वो चाँद दिखा था मुझे साँझ ढलते ही।

दोनों हाथ सने थे लाल दस्तानों से,
ख्वाब दिखा था मुझे हाथ मलते ही।

ढूंढता गया कितने मुखौटे उतार कर,
उससे मिलना था जो मुझे चलते ही।

कितने नक्शे बदले तुझे खोजने में,
हर मोड़ खड़ा था रास्ते बदलते ही।

– मिश्रा राहुल (0९-दिसंबर-२०१७)

2

खुमारी

अकेली आँखों में ऐसी खुमारी दे दे,
कहीं धूप दिखे तो मुझे उधारी दे दे।

मर्ज गिनता रहता रोज कागजों में,
मन भर जाए मुझे ऐसी बीमारी दे दे।

तनहा दौड़ती सुस्त रातों में गलियां,
यार मिल जाए मुझे ऐसी सवारी दे दे।

थक गया मैं अल्फाजों की रद्दी जुटाते,
दर्द ले जाए मुझे ऐसी आलमारी दे दे।

(मिश्रा राहुल) (07-दिसंबर-2017)
(©खामोशियाँ-२०१७)(डायरी के पन्नो से)

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