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अंजान

तलाश कर शागिर्द अपना तू अंजान थोड़े है,
अपने शहर में घूम रहा तू मेहमान थोड़े है।

आ जाएगी रोशनी अपना रास्ता बदल कर,
तेरे घर में बस एक ही रोशनदान थोड़े है।

कभी दिल से उछालो किस्मती पत्थर यारों,
हर छत पर बस एक ही आसमान थोड़े है।

खिलते नहीं हैं फूल पत्थर की तासीर पर,
ये किसी का आंगन है तेरा बागबान थोड़े है।

– मिश्रा राहुल | खामोशियाँ-2018
(डायरी के पन्नो से)(09/मार्च/2018)

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1 Response

  1. बहुत खूब …
    हर शेर अलग अंदाज़ का गहरी बात कहता हुआ …

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