fbpx

अरमान

यूँ राख हुआ था अरमान जलते ही,
कोई मिल गया था मुझे निकलते ही।

लोगों के पॉकेट की तलाशी लीजिये,
वो चाँद दिखा था मुझे साँझ ढलते ही।

दोनों हाथ सने थे लाल दस्तानों से,
ख्वाब दिखा था मुझे हाथ मलते ही।

ढूंढता गया कितने मुखौटे उतार कर,
उससे मिलना था जो मुझे चलते ही।

कितने नक्शे बदले तुझे खोजने में,
हर मोड़ खड़ा था रास्ते बदलते ही।

– मिश्रा राहुल (0९-दिसंबर-२०१७)

Share

You may also like...

2 Responses

  1. बहुत बढ़िया …बेहतरीन

  2. बहुत खूब … चाँद वाला शेर तो लाजवाब है …
    पूरी ग़ज़ल जबरदस्त …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *