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Author: Misra Raahul

क्या हम भी बन सकते हैं शकुंतला देवी ?

इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले हमें यह जानना होगा कि शकुंतला देवी कौन है? आजकल इनकी चर्चा जोरों पर है क्योंकि बॉलीवुड इन पर ही बायोपिक फिल्म बना रहा है। खैर शकुंतला देवी किसी बायोपिक की मोहताज तो नहीं है और उन्हें कौन नहीं जानता। अब जिस से भी पूछेंगे उनका जवाब यही होगा की शकुंतला देवी एक मानव कंप्यूटर हैं जो कंप्यूटर की गति से गणना करती हैं।

इस पर मेरा जवाब है हां आपने सही फरमाया। यह वही शकुंतला देवी हैं जिन्होंने कई बार अपनी गणना से कंप्यूटर को भी चौंका दिया है। अब मेरे टाइटल प्रश्न के जवाब की बारी। हां हम भी बन सकते हैं शकुंतला देवी। पर उससे पहले मैं कुछ प्रश्न आपके समक्ष रखना चाहूंगा।

क्या आजकल की शिक्षा प्रणाली गणितीय सूत्रों को रटने की है? क्या आपके बच्चे स्कूल में ज्यादातर सूत्रों को रटकर परीक्षाओं में शानदार अंक हासिल करते हैं? इन दोनों प्रश्नों पर आपका जवाब होगा हां। अब मैं आपको कंप्यूटर की तरफ ले जाता हूं एक कंप्यूटर क्या होता है? यही ना की एक मशीन जो तर्कसंगत तरीके से काफी तेज गति से गणना करने में सक्षम यंत्र है। ऊपर दी भी लाइन में एक महत्वपूर्ण शब्द है तर्कसंगत(लॉजिकल) तरीके से।

तर्कसंगत होने या फिर लॉजिकल होने का किसी भी सूत्र से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। लॉजिकल होना एक स्वाभाविक नियम है जो किसी विषय या किसी टॉपिक पर बंधकर नहीं रह सकता है। अगर आप सभी अपने में लॉजिकल थिंकिंग को विकसित कर लेंगे तो आप की सीमाएं किसी सूत्र में बंधकर नहीं रहेंगे बल्कि आप जाने कितने सूत्र का निर्माण खुद ही कर देंगे।

हमने अपने शैक्षिक काल में जाने कितने सूत्र को रटा था। वह भी सिर्फ इसलिए की हम किसी प्रश्न का उत्तर तेजी से दे सकें। पर इन सब में हमें रोज सुबह उठकर सूत्र को रटने की प्रक्रिया दोहरानी पढ़ती थी। और इसी रखने के चक्कर में कभी-कभी हम लोग वर्ग के क्षेत्रफल में आयत का सूत्र लिख डालते थे। पर इस पूरे घटना चक्र को अगर हम तर्कसंगत तरीके से सोचें तो क्या हमें वह सूत्र याद रखने की जरूरत थी? या फिर क्या हमें अलग-अलग आकृति के सूत्रों को याद रखने की जरूरत है? नहीं ना फिर अगर हम तर्कसंगत तरीके से सोचें तो हम किसी भी आकृति का क्षेत्रफल बड़े आसानी से थोड़ा समय लगा कर निकाल सकते हैं। इसके साथ ही हम किसी विकृत आकृति का क्षेत्रफल का सूत्र भी बना सकते हैं। फिर यह रटने रटाने का परंपरा क्यों?

एक और अनुभव हमने चिन्हित किया है की स्कूलों में लोग किसी एक विषय को लेकर काफी ज्यादा हौवा बना देते हैं। और यह खासतौर पर भौतिकी और गणित के साथ होता है। अंग्रेजी में एक कोटेशन है कि “Practice makes a man Perfect” लेकिन अब यह कहावत थोड़ी बदल गई है “Logic makes a man Shakuntala Devi”

स्कूल की शिक्षण प्रणाली बदलना हमारे बस में नहीं है लेकिन हम अपने अगल-बगल के लोगों के अंदर तर्कसंगत होने का आचरण तो डाली सकते हैं। और यह करने पर वह दिन दूर नहीं है कि हम पूरे भारतवर्ष में न जाने कितनी शकुंतला देवी को अपने इर्द-गिर्द पाएंगे।

मिश्रा राहुल
(ब्लॉगर और लेखक)

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समझ

समझ है पर समझे नहीं थे तुम कभी,
समझना होगा तो समझ लेंगे तुझे भी।

ख्वाहिशें लड़ रही सपनो की तरफ से,
ज़रा सांस ले लेंगे तो जीत लेंगे उसे भी।

मुख़्तसर ही सही पर साथ चल ज़रा,
फलक से दो चाँद लाकर देंगे तुझे भी।

कोई खिताब हासिल करना चाहत नहीं,
मुख़ातिब हो मुझसे खोज लेंगे उसे भी।

– मिश्रा राहुल | डायरी के पन्नो से
©खामोशियाँ-2018 | 31 – मई – 2018

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मैं गीत वही दोहराता हूँ

मैं डूब डूब के चलता हूँ,
मैं गीत वही दोहराता हूँ।

जो दौड़ कभी था शुरू किया,
उस पर दम भी भरता हूँ।
हर रोज ही अपनी काया को,
तेरे पर अर्पित करता हूँ।

कुछ बीज अपने सपनो के,
मैं खोज खोज के लाता हूँ।
एक कल्पतरु लगाने को,
मैं रीत वही दोहराता हूँ।

मैं डूब डूब के चलता हूँ,
मैं गीत वही दोहराता हूँ।

दो हाथ जुड़े कई हाथ मिले,
कुछ मोती से मुक्ताहार बने।
जो साथ चले वो ढाल दिए,
हम रणभेरी से हुकार किए।

हर बाधा से दो-चार किए,
हम ताकत से प्रतिकार किये।
फिर वही से मैं सुनाता हूँ,
मैं प्रीत वही बताता हूँ।

मैं डूब डूब के चलता हूँ,
मैं गीत वही दोहराता हूँ।

– खामोशियाँ | (20 – फरवरी – 2018)

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ख्वाहिशें

कुछ ख्वाहिशें हम भी पालना चाहते हैं,
थोड़ा ही सही पर रोज मिलना चाहते है।

मरने का कोई खास शौक नहीं है हमें,
जिंदा रहकर बस साथ चलना चाहते हैं।

रोज आता चाँद पुरानी बालकनी पर,
ऐसी ही कुछ आदतें डालना चाहते हैं।

यादों के कोरों में बूंद जैसा रिसकर,
अकेली नुक्कड़ पर घुलना चाहते है।

कभी मिलो ज़िंदगी फुरसत में मुझसे,
तेरे साथ एक सुबह खिलना चाहते हैं।

©खामोशियाँ-2018 | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से)(05-सितंबर-2018)

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दुनिया

कुछ जरूरतें तेरी तो कुछ हमारी है,
इन बातों में उलझी दुनिया सारी है।

मोहब्बत की मुखबिरी कौन करता,
पूरा शहर ही इस खेल का मदारी है।

हर शख्स किसी मीठी जेल में होता,
खाकर सबने अपनी सेहत बिगाड़ी है।

चेहरे की मुस्कान उनको पचती कहाँ,
दुख बाटना ही जिनकी दुकानदारी है।

फेट रहा हूँ पत्ते लौटाने सबकुछ आज,
तेरी उम्मीद ही तेरी असल बीमारी है।

©खामोशियाँ – 2018 | मिश्रा राहुल
(26 – जुलाई -2018)(डायरी के पन्नो से)

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बात

baat-misra-raahul

तुम बात करो या ना करो पर रूठो ना,
इस कदर उलझाकर मुझको कोसो ना।

मैंने सौदे किए तुमसे अपनी चाहतों का,
कभी इस तरीके से मुझको सोचो ना।

चुप हूँ मैं कि दर्द देना नहीं और तुम्हे,
सन्नाटों नें कैसे जकड़ा मुझको पूछो ना।

जुगनू सितारे सब अपने घरों में सोए,
यूं अकेली रात में किसीको खोजो ना।

– मिश्रा राहुल | 27 – मई – 2018
(©खामोशियाँ) (डायरी के पन्नो से)

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राज

इतने दिनों तक तो चुप था दिल,
चल उसे भी कुछ कहने देते हैं।

आ जाएगी अपने रिश्तों में चमक,
खुद को अंदर तक जलने देते हैं।

कब तक सहेज पाएंगे राज अपने,
खोल किताब उनको पढ़ने देते हैं।

एक अधूरी गज़ल पड़ी बरसों से,
चलो किसी को पूरा करने देते हैं।

चुप रहकर पत्थर हो गया था मैं,
हर रोज कुछ आदतें पलने देते हैं।

यूं ही नहीं बातों में ज़िक्र अपना,
दिल पर मीठा जुल्म सहने देते हैं।

– मिश्रा राहुल (13-मई-2018)
(©खामोशियाँ-2018) (डायरी के पन्नो से)

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मोबाइलकरण

हमने तकनीक को तीन चरण में बांटा है। Tech X, Tech Y और Tech Z।

Tech X वो है जिन्होंने स्मार्टफोन जब उठाया तो उनके बाल सफेद हो चुके थे।
Tech Y वो है जिन्होंने स्मार्टफोन जब उठाया तब वो जिम्मेदार हो चुके थे।
Tech Z वो है जिन्होंने स्मार्टफोन जब उठाया तब वो चलना शुरू नहीं किये थे।

हमारे देश में Tech Y की तादाद ज्यादा है। उनके पास हुनर है। काबिलियत है पढ़े लिखे हैं। अच्छा मोबाइल के मेनू और फीचर इस्तेमाल करते हैं। पर घर में कुछ लोगों ने आपकी अच्छी परवरिश के लिए खुद को इतना बांध लिया था कि उन्होंने कभी स्मार्टफोन की आवश्यकता नहीं दिखाई।

आप अगर काबिल हो जाए तो मातृ दिवस पर अपनी मम्मी को एक स्मार्टफोन गिफ्ट जरूर करें। साथ ही साथ रोज उन्हें उससे चलाना भी सिखाए। उनके न समझ आने पर उन्हें नम्रतापूर्वक समझाए। कभी आपके खिलोने तोड़ने पर भी मां ने भी आपके कान न उमेठते हुए मुस्कुरा कर आपको कहा होगा। कोई बात नही दूसरा आ जाएगा।

आप छोटी छोटी ट्यूटोरियल उन्हें दें जैसे:
– उन्हें फेसबुक और इंस्टाग्राम पर
– अपनी तस्वीरें पोस्ट करना सिखाए
– उन्हें यूट्यूब पर वीडियो खोजना सिखाए।
– उन्हें अपने पसंद की शॉपिंग करने सिखाए।
– उन्हें वीडियो कॉलिंग के बारे में समझाए।

आप एक बार कोशिश करिए। आपकी कोशिश जरूर रंग लाएगा। आप कब दे रहे है अपनी मम्मी को स्मार्टफोन।

– मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

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चित्र

अब देख रहा हूँ तुझे मेरी फिक्र नहीं है,
इस बदले लहज़े में अपना ज़िक्र नहीं है।

गुलाब आज भी महकता पुरानी डायरी से,
बहुत खोजा इसके पास कोई इत्र नहीं है।

बहुत सारे कदम तो मेरे भी उसने चले हैं,
ऐसे कैसे कह दूं कि वो मेरा मित्र नहीं है।

जो दीवारों पर टंगा वो बसा है यादों में,
काठ के खांचों का बस एक चित्र नहीं है।

©खामोशियाँ-2018 | मिश्रा राहुल
(22 – अप्रैल – 2018)(डायरी के पन्नो से)

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लप्रेक 12

 

धूधली सी शाम में श्याम के कंधों पर सर रखकर बैठी थी। काफी देर तक की खामोशी को चीरते हुए, नीतू नें आसमान में आकृति दिखाते हुए कहा चलो न उस बादल के पीछे चले।

एक बादल से दूसरे पर आइस-पाइस खेलेंगे। तुम सूरज ओढ़ लेना मैं चाँद पॉकेट में छुपा लूँगी। फिर अदला बदली करेंगे दोनों का। ले जाऊँगी बहुत दूर मेरी नानी के गाँव में ये चाँद गड्ढे में छुपा दूँगी। फिर चाँद दिन पूरी करने ना आएगा।

और मैं तुम्हारे साथ यहीं पूरे एक दिन एक सौ बरस जैसे गुज़ार दूँगी।

© खामोशियाँ – 2016 | मिश्रा राहुल
(06 – अप्रैल – 2016) (डायरी के पन्नो से)

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