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बेतरतीब उलझन

फुर्सत में ठहरो तो कुछ हम भी कहे,
आँखों में उतरो तो कुछ हम भी कहे।

बेतरतीब उलझन फैली हैं इर्द-गिर्द,
आ सुलझें खुद सुलझानें को भी कहे।

फ़लक नें रोक रखे बहुत टूटे सितारे,
ऊपर झांकों तो गिराने को भी कहे।

शाम की जुल्फें कान के पार लगाए,
वादे किए है जो निभाने को भी कहे।

अच्छा है जो थम गया मर्ज तेरा-मेरा,
सुने ज़िंदगी की सुनाने को भी कहे।

©खामोशियाँ-२०१५ | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से)(२३-नवंबर-२०१५)

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5 Responses

  1. JAY BARUA says:

    सुन्दर शब्द चयन |

  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (25-11-2015) को "अपने घर भी रोटी है, बे-शक रूखी-सूखी है" (चर्चा-अंक 2171) पर भी होगी।

    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    कार्तिक पूर्णिमा, गंगास्नान, गुरू नानर जयन्ती की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

  3. जय मां हाटेशवरी….
    आप ने लिखा…
    कुठ लोगों ने ही पढ़ा…
    हमारा प्रयास है कि इसे सभी पढ़े…
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना….
    दिनांक 25/11/2015 को रचना के महत्वपूर्ण अंश के साथ….
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की जा रही है…
    इस हलचल में आप भी सादर आमंत्रित हैं…
    टिप्पणियों के माध्यम से आप के सुझावों का स्वागत है….
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ…
    कुलदीप ठाकुर

  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, कहीं ई-बुक आपकी नींद तो नहीं चुरा रहे – ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है … सादर आभार !

  5. बहुत सुंदर रचना । मेरी ब्लॉग पर आपका स्वागत है |

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