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Category: गज़ल

क्या हम भी बन सकते हैं शकुंतला देवी ?

इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले हमें यह जानना होगा कि शकुंतला देवी कौन है? आजकल इनकी चर्चा जोरों पर है क्योंकि बॉलीवुड इन पर ही बायोपिक फिल्म बना रहा है। खैर शकुंतला देवी किसी बायोपिक की मोहताज तो नहीं है और उन्हें कौन नहीं जानता। अब जिस से भी पूछेंगे उनका जवाब यही होगा की शकुंतला देवी एक मानव कंप्यूटर हैं जो कंप्यूटर की गति से गणना करती हैं।

इस पर मेरा जवाब है हां आपने सही फरमाया। यह वही शकुंतला देवी हैं जिन्होंने कई बार अपनी गणना से कंप्यूटर को भी चौंका दिया है। अब मेरे टाइटल प्रश्न के जवाब की बारी। हां हम भी बन सकते हैं शकुंतला देवी। पर उससे पहले मैं कुछ प्रश्न आपके समक्ष रखना चाहूंगा।

क्या आजकल की शिक्षा प्रणाली गणितीय सूत्रों को रटने की है? क्या आपके बच्चे स्कूल में ज्यादातर सूत्रों को रटकर परीक्षाओं में शानदार अंक हासिल करते हैं? इन दोनों प्रश्नों पर आपका जवाब होगा हां। अब मैं आपको कंप्यूटर की तरफ ले जाता हूं एक कंप्यूटर क्या होता है? यही ना की एक मशीन जो तर्कसंगत तरीके से काफी तेज गति से गणना करने में सक्षम यंत्र है। ऊपर दी भी लाइन में एक महत्वपूर्ण शब्द है तर्कसंगत(लॉजिकल) तरीके से।

तर्कसंगत होने या फिर लॉजिकल होने का किसी भी सूत्र से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। लॉजिकल होना एक स्वाभाविक नियम है जो किसी विषय या किसी टॉपिक पर बंधकर नहीं रह सकता है। अगर आप सभी अपने में लॉजिकल थिंकिंग को विकसित कर लेंगे तो आप की सीमाएं किसी सूत्र में बंधकर नहीं रहेंगे बल्कि आप जाने कितने सूत्र का निर्माण खुद ही कर देंगे।

हमने अपने शैक्षिक काल में जाने कितने सूत्र को रटा था। वह भी सिर्फ इसलिए की हम किसी प्रश्न का उत्तर तेजी से दे सकें। पर इन सब में हमें रोज सुबह उठकर सूत्र को रटने की प्रक्रिया दोहरानी पढ़ती थी। और इसी रखने के चक्कर में कभी-कभी हम लोग वर्ग के क्षेत्रफल में आयत का सूत्र लिख डालते थे। पर इस पूरे घटना चक्र को अगर हम तर्कसंगत तरीके से सोचें तो क्या हमें वह सूत्र याद रखने की जरूरत थी? या फिर क्या हमें अलग-अलग आकृति के सूत्रों को याद रखने की जरूरत है? नहीं ना फिर अगर हम तर्कसंगत तरीके से सोचें तो हम किसी भी आकृति का क्षेत्रफल बड़े आसानी से थोड़ा समय लगा कर निकाल सकते हैं। इसके साथ ही हम किसी विकृत आकृति का क्षेत्रफल का सूत्र भी बना सकते हैं। फिर यह रटने रटाने का परंपरा क्यों?

एक और अनुभव हमने चिन्हित किया है की स्कूलों में लोग किसी एक विषय को लेकर काफी ज्यादा हौवा बना देते हैं। और यह खासतौर पर भौतिकी और गणित के साथ होता है। अंग्रेजी में एक कोटेशन है कि “Practice makes a man Perfect” लेकिन अब यह कहावत थोड़ी बदल गई है “Logic makes a man Shakuntala Devi”

स्कूल की शिक्षण प्रणाली बदलना हमारे बस में नहीं है लेकिन हम अपने अगल-बगल के लोगों के अंदर तर्कसंगत होने का आचरण तो डाली सकते हैं। और यह करने पर वह दिन दूर नहीं है कि हम पूरे भारतवर्ष में न जाने कितनी शकुंतला देवी को अपने इर्द-गिर्द पाएंगे।

मिश्रा राहुल
(ब्लॉगर और लेखक)

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अल्फाज़

किसी बन्द लिफाफे का अल्फाज़ मत होना,
छुपाकर रखना सन्दूक में दराज़ मत होना।

ढूंढ लेना किसी शाम यूँ अकेले फलक पर,
चांद कभी न निकले तो नाराज़ मत होना।

रोज खोजना अपना अक्स अपने ही अंदर,
कोई बदले इतना पुराना रिवाज़ मत होना।

अपनी शाम से रोज थोड़ा वक़्त निकालना,
जो खुद मे डूबा रहे ऐसा समाज मत होना।

अल्फाज़ (12- जून -2020)
©खामोशियाँ-2020 | मिश्रा राहुल

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समझ

समझ है पर समझे नहीं थे तुम कभी,
समझना होगा तो समझ लेंगे तुझे भी।

ख्वाहिशें लड़ रही सपनो की तरफ से,
ज़रा सांस ले लेंगे तो जीत लेंगे उसे भी।

मुख़्तसर ही सही पर साथ चल ज़रा,
फलक से दो चाँद लाकर देंगे तुझे भी।

कोई खिताब हासिल करना चाहत नहीं,
मुख़ातिब हो मुझसे खोज लेंगे उसे भी।

– मिश्रा राहुल | डायरी के पन्नो से
©खामोशियाँ-2018 | 31 – मई – 2018

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अल्फाज़

अल्फाज़ फाड़कर सिलते क्यूं हो,
रोज थोड़ा थोड़ा लिखते क्यूं हो।

काठ के दराज़ ऐसे गुफ्तगू करते,
पुरानी वसीयत में मिलते क्यूं हो।

मतला कहो फिर ग़ज़ल सुनाओ,
रदीफ़ काफियों से जलते क्यों हो।

शहरी खिड़कियाँ हैं चमकते रहती,
इतना भी आंखों को मलते क्यूं हो।

तारो से गुजारिश करो मान जाएंगे,
जुगनुओं से इतना लड़ते क्यों हो।

ज़िन्दगी है अपनी कारवां है अपना,
हर पल तुम इतना चलते क्यों हो।

©खामोशियाँ-2019 | मिश्रा राहुल
(01-अप्रैल-2019) | (डायरी के पन्नो से)

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दुवाएँ

जो जल रहा उसे और जलाया करिये,
कुछ देर ही सही पर मुस्कुराया करिये।

अजीब शौक तुझे प्याली सजाने का,
किसी अपने को शाम बुलाया करिये।

खुल जाएगी अमीरज़ादों की कलई,
उनके चेहरे का नकाब हटाया करिये।

कमियाँ खोजनी नही पड़ेगी आपको,
रिश्तेदारों के घर हर रोज जाया करिये।

अंजाम दुआओं में निकलकर आएगा,
हर किरदार मनभर कर निभाया करिये।

©खामोशियाँ-2019 | मिश्रा राहुल
(17-मार्च-2019)(डायरी के पन्नो से)

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गाँव

लोग गाँव से जैसे शहर आते है,
खुद में ही डूबते नज़र आते है।

चेहरे पर हंसी रोककर रखे कैसे,
अपने ही ख्वाबों से डर जाते हैं।

इस टीन की छप्पर में सुकून है,
कुछ देर और यहां ठहर जाते है।

बचपन में ढूंढा था जिन रंगों को,
फिरसे तितलियों के घर जाते है।

लम्हों की अपनी कहानियां होती,
जिसे सुनाकर लोग गुजर जाते है।

©खामोशियाँ-2019 | मिश्रा राहुल
(06-मार्च-2019)(डायरी के पन्नो से)

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ख्वाहिशें

कुछ ख्वाहिशें हम भी पालना चाहते हैं,
थोड़ा ही सही पर रोज मिलना चाहते है।

मरने का कोई खास शौक नहीं है हमें,
जिंदा रहकर बस साथ चलना चाहते हैं।

रोज आता चाँद पुरानी बालकनी पर,
ऐसी ही कुछ आदतें डालना चाहते हैं।

यादों के कोरों में बूंद जैसा रिसकर,
अकेली नुक्कड़ पर घुलना चाहते है।

कभी मिलो ज़िंदगी फुरसत में मुझसे,
तेरे साथ एक सुबह खिलना चाहते हैं।

©खामोशियाँ-2018 | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से)(05-सितंबर-2018)

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दुनिया

कुछ जरूरतें तेरी तो कुछ हमारी है,
इन बातों में उलझी दुनिया सारी है।

मोहब्बत की मुखबिरी कौन करता,
पूरा शहर ही इस खेल का मदारी है।

हर शख्स किसी मीठी जेल में होता,
खाकर सबने अपनी सेहत बिगाड़ी है।

चेहरे की मुस्कान उनको पचती कहाँ,
दुख बाटना ही जिनकी दुकानदारी है।

फेट रहा हूँ पत्ते लौटाने सबकुछ आज,
तेरी उम्मीद ही तेरी असल बीमारी है।

©खामोशियाँ – 2018 | मिश्रा राहुल
(26 – जुलाई -2018)(डायरी के पन्नो से)

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बात

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तुम बात करो या ना करो पर रूठो ना,
इस कदर उलझाकर मुझको कोसो ना।

मैंने सौदे किए तुमसे अपनी चाहतों का,
कभी इस तरीके से मुझको सोचो ना।

चुप हूँ मैं कि दर्द देना नहीं और तुम्हे,
सन्नाटों नें कैसे जकड़ा मुझको पूछो ना।

जुगनू सितारे सब अपने घरों में सोए,
यूं अकेली रात में किसीको खोजो ना।

– मिश्रा राहुल | 27 – मई – 2018
(©खामोशियाँ) (डायरी के पन्नो से)

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राज

इतने दिनों तक तो चुप था दिल,
चल उसे भी कुछ कहने देते हैं।

आ जाएगी अपने रिश्तों में चमक,
खुद को अंदर तक जलने देते हैं।

कब तक सहेज पाएंगे राज अपने,
खोल किताब उनको पढ़ने देते हैं।

एक अधूरी गज़ल पड़ी बरसों से,
चलो किसी को पूरा करने देते हैं।

चुप रहकर पत्थर हो गया था मैं,
हर रोज कुछ आदतें पलने देते हैं।

यूं ही नहीं बातों में ज़िक्र अपना,
दिल पर मीठा जुल्म सहने देते हैं।

– मिश्रा राहुल (13-मई-2018)
(©खामोशियाँ-2018) (डायरी के पन्नो से)

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