fbpx

दलील

दिल भी अब कहाँ खामोश बैठता है,
वक़्त की शाखों पर बेहोश बैठता है।

धड़कता रहता है सीने में हर पहर,
पूछ उससे कितना मदहोश बैठता है।

खोते है लफ्ज गहराइयों में किसी के,
रोज़ तभी लेकर शब्दकोश बैठता है।

दलीलें चलती हर रोज़ मुकदमे की,
मुकद्दर लिए रोज़ निर्दोष बैठता है।

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से)(०३-अक्तूबर-२०१४)

Share

You may also like...

1 Response

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *