धोखा

नकाब…फरेब…
धोखा…साजिश…!!

सुबह उठो तो
बारिश का धोखा,
चमकती रात में
अमावस का धोखा…!!

अकेले पहिये पर
घिसटता इंसान,
जिसको मिलता
कंकड़ का धोखा…!!

बसंत खड़ी पास
फिर भी मिलता,
अक्सर गुलों के
बिखरने का धोखा…!!

सुख के वक़्त में
मिला दर्द का धोखा,
जीत की स्वाद में
रहता हार का धोखा…!!

ज़िंदगी क्या है ??
साजिश या धोखा ??
_____________________
©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(१७-अक्तूबर-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

Share

You may also like...

3 Responses

  1. कल 19/अक्तूबर/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

  2. वाह …मन के कोमल भावो का बहुत सुन्दर चित्रण किया है…………बेहद शानदार प्रेममयी प्रस्तुति।

  3. Onkar says:

    सुंदर रचना

Leave a Reply

Your email address will not be published.

error: Content is protected !!