fbpx

डायरी

कभी कभी
भूल जाता,
पन्ने लिखना
डायरी के।

दिन हर रोज़
एक सा ही तो रहता।
सुबह के अखबार से,
रात की खामोशी तक।

आखिर,
कॉपी-पेस्ट ही
तो करते है हम।

आस की लाईमलाइट
मे आज भी चलती है,
सपनों की रील।

आजकल,
रिवाइंड बटन
काम नहीं करता।
_____________________
©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(२२-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

Share

You may also like...

2 Responses

  1. Smita Singh says:

    बहुत ही सुन्दर शब्दानुभूति

  2. लगता है ये कविता मेरे लिए रची गई है.. मन को छू कर निकल गई…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *