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दुष्यंत कुमार: हिन्दी ग़ज़ल के रचयिता

ग़ज़ल हिंदी में भी कही जा सकती है वह भी शुद्ध हिंदी में दुष्यंत कुमार जी ने यह करके दिखाया था। कहा जाता है कि ग़ज़ल मूलतः फारसी काव्य की विधा है। फिर फारसी से वो उर्दू में आई। परन्तु हिंदी में ग़ज़ल लिखना दुष्यंत कुमार त्यागी जी ने शुरू किया। ऐसा करने से तात्कालिक शायरों में उनको लेकर काफी विरोधाभास था।

दुष्यंत जी की गजलों में उनके समय की परिस्थितियों का वर्णन बखूबी मिलता है। दुष्यंत ऐसे शायर थे जो सिर्फ प्रेम नहीं बल्कि अपने आसपास के परिवेश को भी अपनी ग़ज़ल का विषय बना लेते थे।

उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भ्रष्टाचार पर भी जबरदस्त चोट किया है। वे कहते हैं कि:
इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पांव घुटने तक सना है।

सामाजिक परिवेश पर लिखते हुए कहते हैं कि:
इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात,
अब किसी भी बात पर खुलती नहीं है खिड़कियां।

दुष्यंत जी ने बहुत कम समय में वह लोकप्रियता प्राप्त कर ली थी जो हर किसी को नहीं मिलती है किंतु नियति की क्रूर हाथों ने उन्हें छीन लिया। उनका निधन 30 दिसंबर 1975 में हुआ तब वो केवल 42 वर्ष के थे।

दुष्यंत जी इतना आसान लिखते थे कि उनको पढ़ना उनको समझना एक आम आदमी के लिए भी बेहद आसान था। इसी कारण से वह हर वर्ग के लोगों को उतने ही प्रिय हैं। दुष्यंत जी ने यह बता दिया है कि गजल लिखने के लिए या फिर किसी भी कविता को लिखने के लिए। आपको भारी भरकम शब्दों की आवश्यकता बिल्कुल भी नहीं है।

और इस आसान लेखनी की बात को भी उन्होंने अपनी ही गजल में पिरोया था।
मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ,
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ।

दुष्यंत जी की जयंती पर उनको नमन।

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