fbpx

एखट-दुक्खट

कभी
आ ज़िंदगी
एखट-दुक्खट खेलें।

खांचे खींचे,
पहला पूरा,
दूसरा आधे
पर कटा हुआ।

आता है ना??
तुझे पूरा
खांचा खींचना।

गोटी फेंकें
बढ़ाएँ चाल।
चल जीतें
घर बनाए ।

अपने
घर में
आराम से रुकें
सुकून पाए।

फिर
जल्दी निकल दूसरे
के पाले फांग जाए।

कभी
आ ज़िंदगी फिर से
एखट-दुक्खट खेलें।

©खामोशियाँ-२०१४॥ मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (०४-जनवरी-२०१५)

Share

You may also like...

1 Response

  1. जिंदगी तो अक्सर खेलती है ये खेल … चुपके चुपके …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *