फरिश्ता

मिस्टर विशाल मेहरा….
सुबलक्ष्मी प्राइवेट लिमिटेड के जनरल मैनेजर। एक अजीब से सख्स बड़े तुनुकमिजाजी व्यक्तित्व के आदमी। ऑफिस हो या घर बार चिल-पों करना इनकी फितरत है। काम हो या ना हो, बात हो या ना हो। हर बात को खुद ही बुनना और खुद ही पेंच फंसा के दूसरे को डांटना तो उनकी आदत थी जैसे।
सोनू वहाँ का चपरासी था, मेहरा जी सबसे ज्यादा डांटते थे उसे। पर शायद सबसे ज्यादा लगाव भी सोनू से ही था तभी तो पिछले बारस बरस से सोनू को हटाया नहीं । अगर एक दिन भी सोनू ऑफिस नहीं आता तो मेहरा जी तो अपाहिज हो जाते। हालांकि ऐसा नहीं था की अकेला सोनू ही वहाँ काम करता था, पर सोनू मेहरा जी की रगों मे दौड़ता था।

ऑफिस के सभी मेहरा जी को चाहते थे (ऊपर से), अंदर तो सभी जाने कौन कौन से रंग-बिरंगे गाली के गुब्बारे छोड़ते। पर इस ऑफिस से उनके काफी गहरे रिश्ते थे। आखिर उनके अभिन्न मित्र और उन्होने मिलकर जो ये कंपनी डाली थी। वक़्त के जंजाल मे कंपनी ने काफी कुछ उधड़े दिन देखे, कितनों को करीब लाया और हाँ जाने कितने करीबी दूर चले गए। मेहरा जी के दोस्त राजेश सक्सेना का कंपनी मे अब कुछ ना था, सिवाय सुबलक्ष्मी नाम के हाँ सुबलक्ष्मी उनकी माताजी का नाम था। जब कंपनी बनी थी तो दोनों के लगभग बराबर शेयर थे, पर 51 फीसदी वाला हिस्सा सक्सेना जी का था। मतलब मालिकाना हक़ सक्सेना जी के पास।
सक्सेना जी बोलते तो बड़ा मीठा थे लेकिन काटते भी तीखा थे वो भी बड़ा प्रेम से। अपने बेवकूफाने रवैये और गलत निर्णयों से उन्होने कंपनी को कर्जे मे डूबा दिया। फिर वो अचानक ही लापता से हो गए।

मेहरा जी ने उनसे संपर्क साधने की काफी कोशिश की पर वो दिखे नहीं। बीवी-बच्चो समेत जैसे अंतर्ध्यान हो गए। सक्सेना जी को थोड़ा खराब लग रहा था, वो राजेश जो कभी उसके कदमो की ताक़त था आज समय पड़ने पर गायब हो गया। पर फिर भी मेहरा जी के मन मे राजेश खातिर कोई राग-द्वेष नहीं था।
“आखिर दोस्त थे उनके, हो सकता है कोई अचानक से काम आ गया हो और हर बात कोई मित्र से थोड़े बताता है ” मेहरा जी मन मे बड़बड़ाए
खैर समय कहाँ रुका वो तो करवट लेता गया। आए दिन मेहरा जी को ताने मिलने लगे। कभी बैंक वाले आ धमकते तो कभी इन्वेस्टर । सुबलक्षमी प्राइवेट लिमिटेड को खींच पाना अब पहाड़ सा लगने लगा था। संपर्क तो अच्छे थे शर्मा जी के पर लोग भी वही पुरानी घिसी पिटी बात बोल उनका मुंह खुलने से पहले लॉक कर देते थे।
“मेहरा जी आप कोई और बिज़नस करिए क्या आप भी बंद हो रही कंपनी मे उलझे पड़े है”
“मेहरा जी नाम बदल लो कंपनी का शायद कोई सुधार हो….”
“मेहरा जी जवाने के साथ चलो कहाँ आप भी”……कमो-बेश यही सबका सुझाव रहता।
पर मेहरा जी तो अलग ही धुन के आदमी थे, वे सुनते तो सबकी थे पर कुछ बोलते ना थे। उनकी यादें जुड़ी जो थी इस कंपनी से। उसने और राजेश ने अपने सपने गढ़े हैं इससे। पर भवनाओं से कंपनी थोड़े चलती। आखिर वो दिन आ ही गया जब बैंक भी गिरवी रखी जमीन जप्त करने आ गए। अभी तक सक्सेना जी का कोई पता नहीं था। बैंक ने मेहरा जी और सक्सेना जी का घर की कुर्की करने के लिए इस्तिहार डाल दिया।

मेहरा जी अभी भी राजेश के रवैये को समझ नहीं पा रहे थे। आखिर उनका मित्र अचानक से ऐसा क्यूँ कर रहा था। अब उन्हे अनहोनी का अंदेशा लग रहा था। पर ऐसे मे वो राजेश का घर बैंचने नहीं देना चाहते थे। क्यूँ की राजेश को तो कुछ पता भी नहीं की यहाँ क्या हो रहा। और शायद वो अचानक से सब कुछ बर्दास्त ना कर पाए। उन्होने अपने सारे बैंक बैलेन्स लगा दिए पर वो सिर्फ सक्सेना हाउस ही बचा सका।
सब कुछ अपने नज़रो के सामने टूटता देख मेहरा जी कई बार थोड़े मायूस तो हुए पर निराश नहीं हुए। आखिर एक फ्लॅट मे रहने वाले मेहरा जी के परिवार को दो कमरे के मकान मे दिक्कत तो हो ही रही थी।
मिसेज मेहरा ने कई बार कोसा “विशाल आखिर सक्सेना को तुम इतना क्यूँ सर पर चढ़ाये बैठे हो, उसने तुम्हें ठगा है और तुमने उसका घर नहीं बिकने दिया….माजरा हमारे कुछ समझ नहीं आ रहा….”
मेहरा जी ने सोनू की तरफ दिखा के बोला, “इसे देखती हो श्रेया ये सोनू है, कल हम अमीर थे तो भी ये यहीं था, आज हम गरीब हैं ये फिरभी यहीं है। पर इसके काम के तरीके मे कोई बदलाव नहीं, बस हमने इसकी पगार मे बदलाव किया। हम लोग तो कुछ भी नहीं इसके आगे।”
श्रेया ने सर हिलाया पर वो शायद संतुष्ट नहीं थी कुछ तो खटक रही थी उसे। पर अनमने ढंग से वो बीच मे ही चाय पटक के चली गई।
मेहरा जी समझ रहे थे, उसे क्या खटक रही पर वो शायद कुछ राज़ को हटाने से कतरा रहे थे।
उसने पुचकारते हुए बोला, “श्रेया गुस्सा नहीं करते, वक़्त आने पर मैं खुद बता दूंगा सब। बाकी कंपनी फिर दौड़ेगी”

यही बोलकर वो तैयार हो चले गए कंपनी की तरफ।
दिन गुजरे, साल गुजरे। सक्सेना जी के हाथ से कमान छूटते ही मेहरा जी ने अपने तरीके से काम आगे बढ़ाया। पुराने लोग पहले ही नौकरी छोड़ दिये थे, हाँ बस सोनू ही वो सख्स था जो पुराने सुबलक्षमी और नए सुबलक्षमी की कड़ी था। तभी तो मेहरा जी सोनू को बहुत मानते थे। बड़े कम ही समय मे विशाल मेहरा ने दुबारा से बैसाखी से लिपटी कंपनी को वापस पैरो पर खड़ा किया। दूसरा घर खरीद लिया।
कभी कभी मेहरा जी राजेश को फोन भी करते रहते थे। पर अब वो थोड़ा खीजने लगे थे। उन्हे सक्सेना का रवैया अच्छा नहीं लग रहा था अब।

आज जल्दी काम लौटकर वो सीधा सक्सेना हाउस पहुंचे। सोनू भी था साथ आखिर सोनू उनका ड्राईवर भी था। अंदर से रौशनी बाहर झांक रही थी तो मेहरा जी ने सोच लगता है राजेश आज ही आया होगा।
मेहरा जी ने सोनू को बोला “बड़े जल्दी और सही समय पे मैं आ गया, तुम यही ठहरो हम ज़रा मिलके आते हैं “।
विशाल ने काफी बेल बजाई, कई बार पागल जैसे चीखा भी राजू…अबे ओ राजू….!!!
अंदर से कुछ आवाज़ हुई, दरवाजा खुल गया। एक समय जो राजेश विशाल को देखते ही खुशी से झूम जाता था। पर आज उसने दरवाजे से गेट तक आने मे 10 मिनट लगा दिए।
राजेश को देखते ही जैसे विशाल ने रहा ना गया। वो तुरंत राजेश से लिपट गया और रोने लगा। विशाल ऐसा रो रहा था मानो किसी पके घाव की पट्टी खुल गयी हो और लहू बंद ना हो रहा हो। आखिर विशाल रोता भी तो कहाँ श्रेया पहले ही टूटी थी। ये सिलसिला पूरे 25 मिनट चला विशाल ने जैसे अपना दुख दर्द पूरा राजेश पर उड़ेलता जा रहा था।

पर राजेश ने एक शब्द भी ना बोला, ऐसा लग रहा था उसे सब कुछ पहले से पता था। इतने मे पीछे से आवाज़ आई।
भाभी चिल्लाई, राजेश!! जल्दी आओ वरना लोग चले जाएंगे। राजेश का बदला रूप विशाल के समझ नहीं आ रहा था। वो खुद को कोस रहे थे, “हम ही तो भूल गए काम मे, आखिर एक बार घर आके मुझे मिलना चाहिए था….मैं ही तो गधा हूँ।” मेहरा जी सब कुछ सोचने मे इतने ताल्लीन हो गए थे कि राजेश कब गया उन्हे पता ही नहीं चला।
पर सोनू ने कुछ सुना था, हाँ वही सब कुछ पर शायद जो वो हिम्मत नहीं जुटा पाया साहब से बोलने का, आखिर एक नौकर की अवकात कितनी।

फिर भी डरते-डरते वो बोल बैठा, “साहब एक बात बताऊँ, राजेश साहब ने आपके पीठ पीछे अपना सक्सेना हाउस बेंच डाला है….”
इतना सुनते ही विशाल बाबू झल्ला गए और खींच के एक थप्पड़ सोनू को रसीद कर दिया। “अबे!! सोनू दिखा दी ना तूने अपनी अवकात। तुम लोग बस यही सब सोच भी सकते।” विशाल उस दिन काफी गुस्से मे थे
घर भी पहुंचे तो बच्चो पर झल्लाए। श्रेया को भी उल्टा-पलटा बोला। फिर खाने पर नुक्स निकाला। बहरहाल मेहरा जी सो गए।
सुबह उठे तो उन्हे थोड़ा तरस आया सोनू पर। सोनू घर उनके उठने से पहले ही आ गया था। उसके गाल पर अपनी उँगलियों के निशान छपे देख बड़ा बुरा लगा उन्हे। सोनू खाना परोस रहा था कि श्रेया ने देखा तो उससे रहा नहीं वो पूछ बैठी, “सोनू कहीं झगड़ा किया क्या…????”
सोनू ने तपाक से बोला, “नहीं मालकिन…मम्मी ने मार दिया कल उन्हे खाना पसंद नहीं आया था…।”
श्रेया को कुछ जवाब पचा नहीं। पर विशाल तो शर्म से पानी पानी हो रहे थे।

सोनू फिर से विशाल को लेकर गाड़ी मे बैठ ही रहा था। मेहरा जी ने आँखों से माफी भी मांग ली और सोनू ने माफ भी कर दिया। ऐसे काफी काम सोनू-मेहरा जी आँखों से कर लेते थे। फिर भी सोनू ने संतोष दिया, “साहब आप ने सही किया था वैसे मुझे मार के अब मैं अपनी अवकात मे रहूँगा।”
तभी मेहरा जी की फोन की घंटी बजी, राजेश का फोन नंबर स्क्रीन पर चमकता देख उन्होने सोनू को चिढ़ाया “देख सोनू, तू गलत था, मेरे यार ने फोन किया मुझे।” इतना कहते ही उन्होने फोन रेसीव किया।
विशाल थोड़ा जल्दी ऑफिस आना “जरूरी काम है, मुझे अब अपना हिस्सा चाहिए कंपनी का मुझे शहर छोडना है। मैं जा रहा हूँ स्मृति का भी मन यहाँ नहीं लग रहा। और उसे इस बिज़नस मे इंटरेस्ट नहीं हम कोई और डालेंगे। कुछ पैसे आ गए है मैंने घर बेंच दिया और बाकी मेरे शेयर दे दे यार”
विशाल के पाँव के नीचे से तो ज़मीन खिसक गयी थी मानो। वो सोनू को देख रहे थे और सोनू उन्हे, फोन लाउड-स्पीकर मोड़ पर था तो राजेश के शब्द पूरे कार को कोने कोने मे गूंज पड़े।
विशाल ने कुछ बोला नहीं बस, “चुप से हो गए….”
मन ही मन सोचा की आखिर मुसीबत केवल मेरे की चौखट पे आकर ठहर जाती क्या। काफी कुछ सोचते रहे पूरी 5 किमी की यात्रा मे। कैसे उनके रोने पर राजेश खुद रो जाता था, कैसे बर्थड़े पर केक सबसे पहले वो ही लेकर आता था। अपने असाइन्मंट कर वो मेरे पर कूद जाता था। आज एक लड़की के कहने पर उसने मेरी दोस्ती ठुकरा दी। चलो दोस्ती गयी तेल लेने, उसने दादी के जुटाये पैसो से जमी कंपनी मे इंटरेस्ट नहीं रहा।
और वो घर जिसमे दादी अम्मा की यादें है वो, जिसके लिए मैंने अपना हर चीज़ दांव पर लगा दिया था।
उसको बेंच कैसे दिया उसने।

अब विशाल को सोनू, श्रेया की हर एक बात 16 आने सही लगती जा रही थी। इसी 5 किमी मे मेहरा जी को इतना कर्कस बना दिया की पता ही नहीं चला। फिर भी किसी का एहसान ना लेने वाले विशाल मेहरा ने फिर एक मिसाल पेश कर दी।
लौटा दिया राजेश का शेयर “जो शायद उसका कभी था भी नहीं”, पर ईमान के सच्चे, वादो के पक्के मेहरा जी ने ज़रा भी नहीं हिचका कंपनी की आधी संपत्ति लौटाने मे।

फिर वही नियम। घर गिरवी कर पूंजी निकालना, श्रेया को जैसे आदत सी हो गयी थी। वो अब कुछ बोलती भी ना थी। घर मे अब पुराने वाले विशाल मेहरा नहीं थे। वो हर बात पर झुझलाने लगे थे, आखिर उनका इंसानियत पर से विश्वास जो उठ चुका था। कभी लोगो के लिए उत्साह के साधन विशाल मेहरा अब टूटने लगे थे। वो ऑफिस तो जाते थे पर उनका मन लगता नहीं था कहीं। हर बात पर उलझ जाना हर बात पर क्रोधित होना उनके लिए आम बात थी। जिससे उनके संबंध ऑफिस वर्करों से दिन-ब-दिन खराब होते जा रहे थे।
इसी वजह से विशाल मेहरा और परेशान होते जा रहे थे। मेहरा जी जितना दूर भागते, कष्ट उनके पद-चाप पकड़े पास चला आता। बस इसी क्रम मे श्रेया ने भी रोकते रोकते आखिर एक दिन चीख पड़ी। उसको चीखता देख विशाल मेहरा बस रो ही दिये।

मेहरा जी ने बड़ी तेज़ आवाज़ मे चिल्लाया “सोनू जल्दी से गाड़ी निकालो….अस्पताल जाना है…..!!”
विशाल अपनी गोद मे श्रेया का सर लेटाए। ज़ोर ज़ोर से रोते जा रहे थे। सोनू भी अपने आप को रोक कहाँ पा रहा था। आखिर उसका घर-परिवार वही तो था। सोनू एक तरफ खुद रोता एक ओर मालिक को ढाढ़स भी बंधाता।
हॉस्पिटल आ चुका था। अगले ही पल श्रेया स्ट्रेचर पर लेटे चीखती हुई अस्पताल मे दाखिल हुई।
शाम तक रिपोर्ट आई।
डॉ साहब ने कहा, “श्रेया की दोनों किडनी खराब हो चुकी है। और ये अचानक नहीं हुआ शायद मेहरा जी आप इसके जिम्मेदार है आपने ध्यान नहीं दिया। आज कल का पति कैसा हो चुका है। जाने क्या-क्या बड़बड़ाते हुए बोलते गए।
विशाल “ओहह किडनी खराब…तो डॉ साहब अब….”
“अब क्या किडनी लगेगी आप व्यवस्था करिए, हम ऑपरेशन कर देंगे” डॉ साहब ने विशाल के कंधे पर हाथ रखते कहा

विशाल मेहरा ने तुरंत ही जाके ऑपरेशन का बिल जमा कर दिया और अपनी किडनी देने की बात की, पर बात ना बनी विशाल बाबू की किडनी नहीं लग पाएगी। मैच नहीं हुई। विशाल मेहरा ने कितनों को फोन किया पर कुछ ने फोन उठाया नहीं कुछ ने ताने मारे। कुछ ने कहाँ मर जाने दे। वगैरा वगैरा जो जिसके मन मे आया।
कुछ समझ ना आने पर उसने सोनू को फोन मिलाया, “उसका भी नंबर बंद”। मन ही मन बड़ी गालियां दी मेहरा जी ने सोनू को “कमीना!! भाग गया सोचा कहीं मालिक उसे अपनी बली का बकरा ना बना लें!!”

सर पर हाथ रखे, विशाल मेहरा कितनी देर से बैठे थे उन्हे पता ही नहीं चला। बस अंदर से आई आवाज़ उनके कानो को गूंज गयी “मेहरा जी!!! आपकी मिसेज को होश आ चुका है “
विशाल बाबू को पता नहीं चला आखिर ये किसने किया। वो सीधा जाके श्रेया से लिपट गए और इशारों मे ही पूछ लिया। श्रेया ने बोला सोनू, तुम कहते थे ना इंसानियत कहाँ है “वो देखो जो बिस्तर पर बेसुध लेटी है ना, वही है इंसानियत”।
विशाल बाबू काफी देर तक सोनू को निहारते रहे। उनके आँसू बड़ी देर तक बरसात करते रहे।
विशाल बस इतना ही बोलते रहे, “इंसानियत कभी मरी नहीं हम हार गए और सोनू जीत गया। कभी एहसान ना लेने वाले विशाल मेहरा जी को एक अदना ना सोनू काफी बड़े एहसान मे बांध दिया था।”

मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

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8 Responses

  1. नही है कोई रिश्ता फिर भी जज्बा होता है,
    दूजे के गम में कभी कोई जब भी रोता है।
    है कहीं इंसानियत थोड़ी बची हुई लगे,
    खुदा भी देख के भरोसे की साँस बोता है।

    श्रेया की कही बात का समर्थन

    इसे और कम करो और लघु की मियाद पर लाओ

  2. Misra Raahul says:

    हाँ भैया थोड़ी सी बड़ी हो गई हमें भी लगा।

  3. achha likha hai …kahani wakai romaanchit karti hai aur dil ko chhuti hai

  4. Misra Raahul says:

    डाक्टर साहब 🙂

  5. बहुत दिलचस्प और वास्तविकता से भरी है। बाकि अनुराग भाई ने भी सही कहा है।

  6. Misra Raahul says:

    अभिलेख हाँ ध्यान दिया जाएगा उस ओर।

  7. Rakesh Pal says:

    Bhai……… U write so deep in such simple form.., WO kahte hain na k farishte isi dharti par kab kis ruup mein mil jaye kya pata……. It was emotional N inspiring tooo

  8. Misra Raahul says:

    राकेश तुमने पढ़ा … समय दिया काफी है।

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