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Genesis 3


धागे में,
डाल रहा,
गौहर ज़िंदगी के।

परख कर,
चुन-चुन कर
बारी बारी से।

हर खूबसूरत मोती
टकराता दूजे से,
आवाज़ होती।

ज़ख्म भी लगते,
रगड़ खा घिस जाते।

पर सब
मिलते तभी,
तो बनती एक
सुंदर मुक्ताहार।
_________________
©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(१७-अगस्त-२०१४) (डायरी के पन्नो से)

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3 Responses

  1. Anita says:

    बनना हो माला तो पिरणा होगा…बिंधना होगा…सुंदर रचना !

  2. BLOGPRAHARI says:

    आपका ब्लॉग देखकर अच्छा लगा. अंतरजाल पर हिंदी समृधि के लिए किया जा रहा आपका प्रयास सराहनीय है. कृपया अपने ब्लॉग को “ब्लॉगप्रहरी:एग्रीगेटर व हिंदी सोशल नेटवर्क” से जोड़ कर अधिक से अधिक पाठकों तक पहुचाएं. ब्लॉगप्रहरी भारत का सबसे आधुनिक और सम्पूर्ण ब्लॉग मंच है. ब्लॉगप्रहरी ब्लॉग डायरेक्टरी, माइक्रो ब्लॉग, सोशल नेटवर्क, ब्लॉग रैंकिंग, एग्रीगेटर और ब्लॉग से आमदनी की सुविधाओं के साथ एक सम्पूर्ण मंच प्रदान करता है.
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    मोडरेटर
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  3. BLOGPRAHARI says:

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