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गुमनाम चेहरा


सलाम साहब….!!!
ज्यों ही रेस्टोरेन्ट का दरवाजा खोला यही सुनने को मिला, “चौधरी स्वीट हाउस मे आपका स्वागत है जी पधारिए” ।
आज कुछ खाली खाली सा लग रहा था, रेस्टोरेन्ट पर मैंने अपना पसंदीदा कोना पकड़ बैठा ही था बस मेनू कार्ड पकड़ा दिया। अक्सर मैं यहीं पर आकर बैठता हूँ क्यूँ….???
इसका शायद पता नहीं, पर लगाव ही समझ लीजिये। जो हो जाता है भले निर्जीव ही सही।
कुछ देर इंतज़ार के बाद एसएमएस डाल दिया….
“I’m waiting Dear….Cme CSH fast…”
इतना लिख सेंड का बटन दबा दिया। कुछ देर रिप्लाइ ना आता देख मैंने कॉफी ऑर्डर कर ली। आज भींड वाकई कम थी तो मुझे लग रहा था लोग मुझे ही देख रहे। खैर मैंने भी फॉर्मल्टी पूरी कर अब थोड़ा रिलैक्स हो गया।
रिप्लाई आने मे वक़्त से मुझे गड़बड़ का अंदेशा हो रहा था, अक्सर लड़कियां प्लान कैन्सल करने वाली होती तो ऐसे नखरे मारती हैं। खैर कॉफी आ गयी साथ रिप्लाइ भी आई। मानो कॉफी मुंह चिढ़ा रही थी हमे, कि पहले एसएमएस पढ़ोगे या मुझे उठाओगे।
हमने ज्यादा उधेड़बुन किए बगैर ही कॉफी को बाजू कर दिया।
फोन अनलॉक कर सीधा इनबॉक्स की ओर तेज़ी से कदम बढ़ाए,
“Cming in 5 mins..plz wt dear..” मैं समझ गया अब आधा-घंटे से ज्यादा लगने वाला। अब इनके आधे-अधूरे मेसेज जैसे चालो को समझने की हुनर भी अपने मे डेवेलप कर लिया था।


मैंने भी बिल पेमेंट करके जाने वाला ही था कि मेरी नज़र कोने पर बैठी लड़की पर पड़ी। चेहरा ठीक से दिख नहीं रहा था पर ना जाने कुछ एहसास था जो मुझे उसकी ओर खींच रहा था। बाल बिखरे थे, साथ मे सूटकेस, हाथ दोनों चेहरो को ढ़ापे । मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। अंकिता का ख्याल आते ही पाँव पीछे सरक जा रहे थे। कहीं उसने मुझे देख लिया तो अच्छा भला अर्थ-अनर्थ हो जाएगा। घड़ी भी अंकिता की 15 मिनट लेट बता रही थी। फिर भी ना चाहते हुए भी मैं खुद को रोक ना पाया और पहुँच गया उसके टेबल पर। 

जैसे ही मैं टेबल पर दस्तक दी उसने अचानक से मुझे देखा। 
अरे….”शिवांगी तुम”….मैं हड़बड़ी मे बोल पड़ा…..!!!
ओहह….राहुल….क्या बताऊँ यार….
वो मुझे ऐसे देखने लगी मानो किसी जनम मे दो लगोटियाँ यार जुदा हो गए हो और आज अचानक से मिल रहे….
अब तो उसकी सिसकियाँ जो किसी कपबोर्ड मे बंद पड़ी थी अचानक से तेज़ हो गयी। उसका मन तो मुझसे लिपट के रोने का हुआ पर जगह की नज़ाकत देख उसने खुद को सम्हाला।
“आखिर हुआ क्या…कुछ तो बोल….ये सूटकेस, तेरे ये हालत…..कैसे क्यूँ और कहाँ से हो गयी….” मैंने उस पर सारे क्वेस्चन टैग झोंक डाले….”
पर उसके मुंह से कुछ निकल ही नहीं पा रहा था, बस बोलते जा रही थी। मेरी ज़िंदगी बर्बाद हो गयी अब मैं कहाँ जाऊँ क्या करू। मुझसे कुछ पूछते ना बन रहा था। 

तभी अंकिता आ गयी। उसने मुझे मेरी शर्ट की परफ्यूम से तुरंत खोज लिया और टेबल लगा के बैठ गयी। 
“राहुल….माफ करना ट्रेफिक थी यार…इसलिए लेट हो गयी….चलो ऑर्डर करो जल्दी….!!
वो मुझे सफाई देने मे इतनी तल्लीन थी शिवांगी को देख ही नहीं रही थी। पर जैसे ही उसको लग गया की मेरा ध्यान कहीं और है उसने नज़र घुमाई। 
“शिवागी….अरे शिवांगी….मेरी स्वीटू…मेरी क्यूटी…कब आई रे….और राहुल तूने बताया भी नहीं एक बार भी….”… अंकिता एक ही सांस मे जाने कितना कुछ बोल गयी, अपनी पुरानी शैली की तरह। 
पर शिवांगी ने कुछ एक शब्द भी बोला नहीं, वो तो कहीं और ही थी। जाने क्या उथल पुथल चल रही थी उसके जेहन मे। 
“अंकी ये कुछ बोलतो ही नहीं…ना कुछ खा ही रही, मैं तो थक गया अब तू ही पूछ…” मैंने जवाब मे सवाल लगाया…
अंकिता समझ गयी थी जगह, माहौल के कारण शिवांगी कुछ बोलने से बच रही। 
राहुल मैं शिवी को लेके बाहर हूँ, तुम बिल कर दो।
“अच्छा….ठीक है” मैंने भी जवाब मे कहा
शिवांगी रोते जा रही थी, जाने क्यूँ आखिर माजरा क्या था। कुछ साफ ना हो रहा था, बड़े अनाब-सनाब ख्यालो से मन कचोट रहा था। फिरभी मैंने खुद को ढाढ़स बंधाया। 

“चलो अब सब मेरे घर और शिवांगी तू अगर अब रोई तो हम दोनों रो देंगे जान ले ” अंकिता ने साफ किया
“ओए, अंकी चुप कर मैं नहीं रोऊंगा चाहे कोई रोये या चुप रहे” मैंने मुस्कुरा के बोला
शिवांगी हल्का सा मुस्कराई….और हमने उसके हंसी पिचकारी मे भर के दुबारा छोड़ दी…!!!
“मत रोना राहुल मैं नहीं चाहती तू रोए…” शिवांगी ने आँसू पोछते हुए बोला 

हम देखते देखते अंकिता के घर चले आए। “अब बता शिवी बात क्या है, तू तो एम्स मे थी ना क्या हुआ और सूटकेस ये सब क्या है ” अंकिता ने फिर अपने लहज मे एक सांस मे पूछ डाला।
वो सुनीता उपाध्या…इतना कहकर फिर शिवांगी चुप हो गयी
“हाँ क्या सुनीता उपाध्या” हमने बात आगे बढ़ाने पर ज़ोर दिया
हाँ एम्स मे थी मैं सारा साल अच्छा जा रहा था। मैं वहाँ अच्छे बच्चो मे गिनी जाती थी। ये फ़ाइनल इयर था मेरा। सुनीता मैडम शुरू से ही मुझे तंग करती थी, पर मैं बार-बार उन्हे अवॉइड कर जाती थी। क्लास मे हर-बार मुझसे सवाल पूछना, बार-बार मेरा असाइन्मंट चेक करना उनकी आदत थी। शुरू-शुरू मे मैंने ध्यान नहीं दिया पर। 
एक बार जब वो मेरा वाई-वा ले रही थी तो वो बोल ही दी 
“तुम लोग x#$%@ नीच जाति वाले आ जाते हो और मेडिकल कैम्पस मे सरपत जैसे बस जाते। तुम लोगो की अवकात बस पैरो के नीचे है। बस तू देख मैं कैसे तुझे पास होने देती हूँ इंटरनल तो मेरे यहाँ से हो के जाते। मेरी बदनसीबी बस ये थी की उस वक़्त मैं ही अकेली आरक्षित लड़की थी (उस जमाने मे हाइयर एडुकेशन मे आरक्षण नहीं था) । मैंने सोचा की सुनीता जी की शिकायत करू पर किससे। क्या मुझे कोई तवज्जो देगा?? सुनीता मैडम का ओहदा काफी बड़ा है लोग लोग जानते उन्हे मुझे ही फटकार लगेगी। 
सो मैंने चुप रहने मे ही भलाई समझी।

“फिर क्या हुआ” अंकिता और मैंने एक सुर मिलाई
होना क्या था। रिज़ल्ट आया फ़ाइनल का और मैं फ़ेल हो गयी। एक महीने पहले ही मेरी शादी की डेट फ़ाइनल हुई थी। रितेश के साथ। रितेश को मैं काफी दिनो से जानती उसके साथ मेरा ताल-मेल अच्छा। 
तो फिर उसको बताई ये सब….??? अंकी ने उत्सुकता से पूछा
नहीं बताई मुझे डर भी है उसका नहीं उसके घर वालो का वो मानेगे नहीं और मैं रितेश को खोना नहीं चाहती थी। मम्मी बुलाई थी पर क्या मुंह लेके जाऊँ। मुझसे रहा नहीं जाएगा और मैं सब उगल दूँगी। तभी रेस्टोरेन्ट मे आके बैठी बाहर कोई देख लिया तो गजब हो जाएगा, लोग फर्जी बातें बनाएँगे लड़की यहीं रहती घर नहीं आती वगैरा-वगैरा तुम लोग समझ सकते समाज को।   
“शिवांगी, तू घबरा नहीं अरे सब उपाध्या जी थोड़े है हाई-कोर्ट है सूप्रीम-कोर्ट है हम केस ठोक देंगे। उनकी मनमानी थोड़े ही है” मैंने उसे हौसला दिया
“केस के लिए पैसे कहाँ मेरे पास, एक तो पहले ही लोन से पटे पड़े है उसको चुकता करने की बारी आई तो मैं फ़ेल हो गयी। अब दुबारा पढ़ने के पैसे भी नहीं….लोन मिलेगा नहीं…कर्जा पटेगा नहीं। क्या करू कुछ समझ नहीं आ रहा। 
“सपने कितने अच्छे होते ना अंकी, जो कभी पूरे नहीं होते…!!” इतना कहकर शिवांगी फिर से फफकने लगी। 
अंकिता ने उसे ढाढ़स बंधाया “अबे!! रो मत हम हैं ना काहे चिंता कर रही। 
शिवांगी रोते रोते….सोती चली गयी।। 

अंकिता सुन “शिवांगी काफी ज्यादा कमजोर हो गयी थी। उसने लगता काफी दिन से कुछ खाया-पीया नहीं। मैंने सोचा रहा हूँ कुछ लेता आऊँ। तू हिलना मत इसका खयाल रखना। मैं अभी गया और अभी आया।
मैं बड़ी तेज़ी से चलता जा रहा था, कुछ समझ नहीं आ रहा था। क्या करू, किससे बोलू क्या दर्द सुनाऊँ। 
फिर भी मैं कुछ देर बजरंग बली के पास से गुज़रा “उन्हे कोसा भी जी भर के मैंने, उल्टा-सीधा बोल डाला जो मन मे था….” 
सारा सामान खरीद पैक करा कर चल ही रहा था कि सोचा एक बार फोन कर पूछ लूँ कि कुछ बाकी तो नहीं बचा अभी। मुझे अंकिता का नंबर तक याद नहीं आ रहा था, जो कि सोते वक़्त भी मेरे दिमाग मे चलता है। 
मैं कांटैक्ट की तरफ बढ़ा और कॉल लगाया….
“पूरी रिंग गयी….कॉल ना उठी “
फिर मैंने उसकी दूसरी सेल पर लगाई वो भी यही स्थिति, मैंने उस समय पचास गाली बकी होगी अंकिता को भगवान कसम। एक तो लड़की बीमार और ऊपर से फोन नहीं उठ रहा। मन मे फिर बुरे ख्यालों का तांता लग चुका था। मेरे कदम काँप रहे थे। मैं शिथिल पड़ता जा रहा था। बार बार रोती हुई शिवांगी नज़र आ रही थी। 

खैर पहुँच गया। ओह इतनी भींड़ हे भगवान क्या हो गया अचानक से। मैंने तेज़ी से पहुंचा पर शायद मुझे देर हो गयी थी। शिवांगी ने मौका देख दरवाजा अंदर से बंद कर लिया था। अंदर उसकी लाश झूल रही थी। 
बिलकुल पेंडुलम जैसे इशारा कर रही हो की वक़्त अब थम चुका है। अंकिता रो रो के बुरा हाल किए हुए थी। 
मुझे भी बड़ा रोना आ रहा था, और मैं बस यही बोले जा रहा था “हाँ शिवांगी मैं खुद को रोक ना पाया…हा शिवांगी मैं खुद को रोक ना पाया।”
“तू रोएगी तो हम सब रोएँगे यही बोलता गया मैं हाँ यही बोलता गया मैं।
मिश्रा राहुल 
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

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8 Responses

  1. अंकी शिवांगी के सम्वाद के साथ राहुल के सम्वाद काफी सारे सरस है । आँखों के सामने घटता सा लगा ।

    अच्छी है ।

  2. Misra Raahul says:

    भैया आपकी टिप्पणियों के लिए पोस्ट हमेशा तरसता।

  3. सन्देश अच्छा ,कहानी अच्छी लगी , एक निवेदन है अगर बाद में ऐसी समस्याओं को उजागर करती कहानियों में इनसे निपटने की संवेदना जाग्रत करते हुए कुछ तरकीबे भी मिल जाती और आनदं आ जाता …धन्यवाद अन्यथा ना ले मेरी टिप्पड़ी को …

  4. Misra Raahul says:

    डाक्टर साहब आगे से ख्याल रखूंगा। धन्यवाद।

  5. Samvaad bahut achche likhe hain, jisase kahani sajeev ho uthi hai

  6. अच्छी कहानी…..सरस प्रवाहपूर्ण संवाद कथा को जीवंत करते हुए…बधाई एक अच्छी रचना हेतु।

  7. Misra Raahul says:

    गीता मैम खामोशियाँ में आपका स्वागत है।
    और कहानी पर समय देने के लिए धन्यवाद।

  8. Misra Raahul says:

    दीदी ब्लॉग पर लगातार नज़र रखने के लिए धन्यवाद।

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