fbpx

इश्क़ में हदें

इश्क़ में हदें जब से बनने लगी,
दिलों में सरहदें भी बनने लगी।

घायल हुए कई कबूतरों के जोड़े,
यादों की खपड़ैल भी टूटने लगी।

सँजोये रखा था बहुत कुछ हमने,
ख्वाबों की चाभी भी रूठने लगी।

कुछ माँझे सुलझते नहीं हैं कभी,
डोर पतंगों की भी छूटने लगी।

मिश्रा राहुल | खामोशियाँ

(26-जुलाई-2015)(डायरी के पन्नो से)


Share

You may also like...

2 Responses

  1. "कुछ माँझे सुलझते नहीं है कभी…"
    So true!

  2. Misra Raahul says:

    हाँ अनुपमा जी कुछ माँझे नहीं सुलझते।
    धन्यवाद ब्लॉग पर पधारने के लिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *