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झंडे


देश की बात हुई झंडे तन गए,
बांस निकल आई डंडे बन गए।

जोश आया कुछ कर दिखाने का,
अगस्त बीता नहीं ठंडे पड़ गए।

काम-धाम छोड़ घर पर रुकते,
बिन छुट्टी लिए संडे मन गए।

दो-चार शेर चंद जुमले चले,
आंच पकी नहीं कंडे जल गए।

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(०८-अगस्त-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

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2 Responses

  1. बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति….

  2. Smita Singh says:

    kya baat hai,,,, waah
    bilkul aaina dikha dia aapne

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