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काफिला


काफिला रुका तो नहीं पर चलता कहाँ है….
दिल सहमा ही तो है अब मचलता कहाँ है…..!!!

सीने मे बर्फ ज़माएँ टहलते लावों पर….
बदन तपता रहता पर पिघलता कहाँ हैं….!!!

एक बरस लग ही जाती बात सुलझाने मे…
मौसम भी दस्तखत ठहरा बदलता कहाँ है….!!!

दोनों हाथो से खीचते लगाम रात-दिन…
काफिला खड़ा ही रहता रोज़ सरकता कहाँ हैं….!!!


©खामोशियाँ-२०१४ 
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1 Response

  1. वाह भाई वाह। क्या कहना, सच है कई बातें होती है जो सुलझाने में कितने वक़्त बीत जाते है…खूब लिखा!!

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