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लप्रेक १


सीटी के साथ ट्रेन निकल पड़ी। खिड़कियों से सटे दो आँखों के बीच दो उँगलियाँ एक दूजे में गुफ्तगू कर रही। पीले बैक्ग्राउण्ड में काले अक्षरों के बोल्ड लेटर में कुछ गुदा है। आपातकालीन खिड़की से पूरा गर्दन बाहर निकालकर देख तो लिया। भुनभुनाया भी “engage” पर स्टेशन जैसा नहीं लग रहा ये नाम।
उसके दुपट्टे ने अभी आधा सर कलम किया था कि “टिकिट दिखाइए”।


उसने टीटी को घूर कर देखा। लो दिखा दो ना। इतना कहकर मुस्कुरा दी और आधे सर कलम की रश्म भी पूरी हो गयी। 

स्क्रीन पर टिकिट था ही नहीं, बस वही पीले बैक्ग्राउण्ड में काले बोल्ड अक्षरों में कुछ गुदा था जो वह आजतक भूल नहीं पाया। स्टेशन का नाम नहीं था। भला अंकगणित में स्टेशन कब से छपने लगे।

©खामोशियाँ | (१३-अगस्त-२०१५)
(मिश्रा राहुल) (डायरी के पन्नो से)
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