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लप्रेक 14

साक्षी के गोरे से हाथों को अपनी बड़ी हथेली में बिछाकर, संजय लकीरों से लुका छिपी खेल रहा था।
कुछ देर चुप रहा। फिर अचानक से बोल पड़ा। अपनी तेरी जोड़ी सुपरहिट है। हथेलियों के मकड़जाल में से एक धागे को छूकर उसने साबित भी किया।


साक्षी चुपचाप हंसनें लगी और बात बड़े शायराना लहजे में समेट दिया।
“हर रोज़ खोजते हो मेरी हाथो की लकीरों में,
ऐसे छेड़ने के अंदाज़ में भला कौन न फ़िदा हो।”

फिर नज़रों की गुफतगू नें पूरा मंज़र रूमानी कर दिया।

– मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवम् लेखक)
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