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लप्रेक ९

जैसे ही कार का दरवाजा बंद होता। अंगूठे और दोनों उंगलियां सीधा म्यूजिक की वॉल्यूम नॉब ही घुमाती।

आवाज़ धीरे धीरे तेज़ होती की कैसेट को फ़ास्ट फारवर्ड लगा दिया जाता। अक्सर दोनों में इसी को लेकर लड़ाई होती थी कि उसने जो पसंद के गाने पर्ची में नोट करवाये थे वो क्यों नहीं भरवाये हमने।

आजकल ड्राइव करता हूँ अकेले, बगल की सीट पर लोग बदलते जाते। आजकल साइड ए ही लगा रहता। न कोई छेड़ता ना कोई पलटता। बजता रहता फिर खुद ही बंद हो जाता या शायद मैं ख्वाब से वापस लौट आता।

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