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मकान बदल जाते



चीख के हर रोज़ अज़ान बदल जाते…..
इंसान ठहरे रहते मकान बदल जाते….!!!

उम्मीद इत्तिला ना करती गुज़रने की…
धूप के साए ओढ़े श्मशान बदल जाते….!!!

दोस्ती-यारी भी अब रखते वो ऐसों से…
एक छत तले कितने मेहमान बदल जाते….!!!

साथ तो आखिर तक ना देता अक्स तेरा….
दिन चढ़ते परछाइयों के अरमान बदल जाते….!!!

©खामोशियाँ-२०१३

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5 Responses

  1. सच कहा है … दिन के साथ साथ परछाइयां बदलने लगती हैं …. सच को लखा है शेर से …

  2. वाह बहुत खूब

  3. rahul misra says:

    दिगंबर सर….स्वागत है…..
    परछाई तो बड़ी बेवफा रहती….
    जितनी लंबी उतनी छोटी दिखती…..!!!

  4. rahul misra says:

    अंजु मैम आप पधारे हमारे ब्लॉग पर हम धन्य हो गए…..सुस्वागतम…..और हार्दिक अभिनंदन..

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