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प्रेम-पत्र बनाम मैसेज


प्रेम का महत्व दिन बदिन कम होने से मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया आखिर इस बात के पीछे सच्चाई क्या है। दिमाग पर काफी ज़ोर डालने पर मालूम चला की पूरा माजरा आज की बदलती तकनीक का है।

प्रेम-पत्र की जगह मैसेज ने ले ली है। जिसमे ना प्रेम होता ना पत्र। हाथ की लेखनी से लेकर पत्र की खुशबू तक सारे गवाही देते उनके साथ होने की। वक़्त लगता तो लग जाए एक हफ्ते दो हफ्ते में जवाब आते। उसी रंगबिरंगे लिफाफे में। रोज़-रोज़ अपने पत्र की इंतज़ार में डाकिया चाचा की सलामती पूछी जाती। वो भी मुस्कुरा के बस इतना कह देते बहू का खत अभी आया नहीं लल्ला।

ये हफ्ते-हफ्ते की बेचैनी, और कुछ सोचने का समय ही कहाँ देती। बस सोचते रहते उनकी सुंदर सुंदर लेखनी में लिपटे उनके भोले भोले जवाब। गुलाबी रंग के लिफाफे गुलाब जैसे महकते उनके बालो की तरह। एक एक हफ्ते पर हाल-चाल जानना आज के समय के हिसाब से तो बड़ा दुर्लभ चित्रण करता। पर उसमे भी अपना मज़ा था।

मोची/दर्जी/माली हर किसी को ख्याल रहता। सब अपनी अपनी तरफ से मदद की हाथ बढ़ाने को तैयार रहते। और हो भी क्यूँ ना प्रेम तो पूजा है। कभी दर्जी काका उनके सूट की चर्चा करते तो मोची चचा उनके सैंड़िल। माली दादा तो अपने गुलाब लिए आते पर शाम को उनको झरता देख रोने से लग जाते।

बरस बीत जाते मुलाक़ात किए/देखे उन्हे जमाने हो जाते। एक झलक खातिर मीलों दूर पैदल चलकर आते और पता चलता आज वो नानी के घर गयी है। पैरो के छाले मुंह चिढ़ाते और दिल उनपर फिर अपने प्यार को पाने के चाहत की लेप लगा भर देता।

लेकिन आजकल के परिवेश में तो फेसबुक/व्हाट्सएप/गूगल प्लस इस बेचैनी को बढ़ने कहाँ देते। सारी बातें तुरंत साफ करने से सोचने के समय में अभाव हो जाता और इस वजह से लोग अनर्गल कर जाते।

– मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

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