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आईना

देख धूप खिसकती…
छज्जो तलक आ गयी..!!

बालकनी मे लेटा लेटा आइना..
फ़्लैश मार चमक रहा..!!
उतार ले नक्श..
फ़िर मिले न मिले..!!
©खामोशियाँ
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अकेली सांझ…!!!

हर सांझ की तन्हाई जाने कितने सवाल अपने अन्दर बसाए रहती….थोड़ी दूर चलते हम…और शायद गली ही रूठ जाती हमसे…रास्ते ही ना होते आगे के…!!!

बड़ी अकेली बैठी शाम का दस्तूर हो गया ,
नजरें थी पास पर वो दिल से दूर हो गया .. !!

किसी चाह्दिवारी में सजे झूमरो जैसे,
वो चाँद भी हमारी पहुच से दूर हो गया .. !!
कितने ग़ज़ल दबे उन पीले किताबों में,
गुनाह किया कितने और वो बेकसूर हो गया .. !!
तनहाइयों ने छेड़ दी वो कशिश ज़िन्दगी में ,
मोहरा आएने में झाकने को मजबूर हो गया .. !!
एक अजब सी सवाल आँख मिजाते पूछती सुबह,
तेरा यार जो पास था वो कैसे दूर हो गया .. !!
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एक बुजुर्ग आइना….

पुराने स्टोर रूम में बिफरा पड़ा था…
एक बुजुर्ग आइना…
मिट्टी सनी दाहिने हाथ की बुसट में…!!

बड़ी नर्म कलाइयों से झाड़ रहा…
पानी गिर रहा अन्दर ही मेरी अक्स से…
रो तो न रहा मैं…बाहर से…!!

साफ़ कर दिया…कुंडी में फंसे कपडे से..
उठा लाया उसे एक झूठ तामिल कराने…!!

रोज झांकता उसमे कितनी खुदगर्जी से..
पर देख बुढ़ापे में भी कितना
साफ़ देखता..वो बुजुर्ग आइना…!!

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