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Tagged: आंशु

ज़िंदगी की कुल्हड़

थामे खाली
यादो के प्याले
हर्फ़ हर्फ़ घूमता हूँ.!!

लिए अकेले
वो मिट्टी शरीर
रोज़ रोज़ गूथता हूँ..!!

बिखरी पड़ी
ज़िंदगी की कुल्हड़
फूंक फूंक तराशता हूँ.!!

पकड़े बाज़ू
अन्श्को की चाय
किसको किसको पिलाता हूँ..!!

©खामोशियाँ

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खामोशियाँ

उमर बढ़ते हैं….
लोग गुजरते नहीं….
पलकों के ख्वाब…
यूंही टूटते नहीं….!!!

कितनी खामोशियाँ
लिए ज़ेब टहलते…
मर्ज की कुल्हड़ मे…
दवा पिरोते नहीं….!!!

कितने मंझो मे
उलझी ज़िंदगी अब…
बादल फटते जाते
पर बरसते नहीं….!!!

कुछ दूर मिलते
दो चट्टान एक दूजे से…
अंश्क सूखे रहते
झरने झरते नहीं….!!

©खामोशियाँ

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भँवरे…!!

भँवरे झांक रहे
दरीचों से…!!

कुंडी मार के
जा रही बसंत…!!
फूल बिखरे
जमीन से लिपटे…!!
माली भी
पोछ रहा आँसू…!!
कितने दिनो
का वास्ता था…!!
कितने दिनो
मे गुजर गया…!!
कौन जाने
कैसे समझाये…!!
रंगो की बातें
जमती थी कभी…!!
बदरंग वादियाँ हैं
वो क्या बतलाए…!!

~खामोशियाँ©

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सपनों की होली…!!

पानी नहीं तो
होली कैसी…!!

रंगो मे हो
सफेदी जैसी…!!

शाम को
छलकेंगे आँसू…!!

और बहकेंगे…
वो भी हरसू…!!

महफिल ना होगी…
लोग न होंगे…!!

फिर भी जमेगी
सपनों की होली…!!

~खामोशियाँ©

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मौसम


निकल गए रास्तों मे तो बहक हम जाएंगे…
बदली हैं अभी शाम तक सितारे छा जाएंगे…!!!

कब से मुह बाए खड़ी सींप दरींचो पर..
बचाओ उन्हे या कौड़ियाल शुक्र मनाएंगे…!!!

बड़ी तेजी से खींचती धूप नयी कोपले…
पकड़ ले वरना लोग दिन मे ही खो जाएंगे…!!!

महफ़िलों मे जरा आंखो पे सजा लेना…
बर्जे पर दो-चार आँसू छोड़ जाएंगे…!!!

बड़ी उदास मन से हर रोज पूछते मेंढक…
आखिर बरसातों के मौसम कब तक आएंगे…!!

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ऋतू की कसमकस…!!


हमारे पुरानी डायरी पलटी तो देखा कुछ शब्द लिपटे थे … बंधे एक दूजे से .. याद नहीं कब किस समय लिखा था पर … फिर भी पढ़ लीजिये .. शायद अच्छा लगे..!!

ऋतू की बाते कुछ हमें भी जमने लगी ..
हम हटे वहा से की बर्फ पिघलने लगी ..!!

छलक जाते है अब इन मैकासों से पैमाने ..
कभी तो धुप थी अब बदरी होने लगी ..!!

कयास लगा रहे थे कि बारिश भी होने लगी ..
लो भीग गए हम अब क्या हवा बहने लगी ..!!

सूखे पत्ते जैसे सिकोड़ कर रख लिया..
कि फिर धूप सर तलक आने लगी..!!

इस कसमकस से उबरने लिए देख ..
अलाव जलाया था कि तूफ़ान बुझाने लगी ..!!

कुछ हद तक छुपाया अपनी हथेलियों से ..
कि अब्र अपनी अन्सको से भिगोने लगी ..!!

क्या हैं क्या ये ऋतू की फेर ए राहुल ..
कभी गर्मी थी वह पर अब सर्दी जकड़ने लगी ..!!

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पुरानी बस्ती…!!!

मुसाफिर बने घुस गया पुरानी बस्ती में ..
अंश्कों को सैन्हारते पंहुचा मस्ती में ..!!

सुखाने बैठा जब भीगे रुमाल देख ..
यादें ही बैठी अलाव जलाए कस्ती में ..!!

फूँक मारा और जल उठे वादों के पुवरे ..
पर जल गया मैं फिर उन्ही परस्ती में  ..!!

गलती थी कुछ तभी झेला हूँ अब तक ..
वरना कौन सजाता पैमाना इतनी सस्ती में  ..!!

धो नहीं पा रहा था लिए ताउम्र उन्हें ..
तभी बंच आया ख्वाब उन्ही पुरानी बस्ती में ..!!

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