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Tagged: अक्स

पुरानी खिड़कियाँ…!!

उचक के झांक रहे…
पुराने यादों के अक्स…!!
पर्दो पे पेंग मारते…
पतझड़ के गमगीन भौरे..!!

कितने अरमान अपने पर
लादे उतार उन्हे ज़रा…!!
कुछ चौड़े लंबे ठहरे…
गर्दन झुकाये घुस रहे…!!

अब बुला रहा तेरी
कोहनी छूने को बर्जा…!!
थोड़ा बेताब हैं वो…
रील घूमा के चलाने को…!!

देखेगा वो भी साथ बैठे…
रोने मत देना उसे…!!
वरना लोग सोचेंगे…
गर्मियों मे अबसार कैसे…!!

~खामोशियाँ©

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एक बुजुर्ग आइना….

पुराने स्टोर रूम में बिफरा पड़ा था…
एक बुजुर्ग आइना…
मिट्टी सनी दाहिने हाथ की बुसट में…!!

बड़ी नर्म कलाइयों से झाड़ रहा…
पानी गिर रहा अन्दर ही मेरी अक्स से…
रो तो न रहा मैं…बाहर से…!!

साफ़ कर दिया…कुंडी में फंसे कपडे से..
उठा लाया उसे एक झूठ तामिल कराने…!!

रोज झांकता उसमे कितनी खुदगर्जी से..
पर देख बुढ़ापे में भी कितना
साफ़ देखता..वो बुजुर्ग आइना…!!

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निशान खत्म…!!!

चलते चलते रुक गया एक मुकाम पर…खोज रहा हूँ कुछ पैरो की छाप पर…मिल नहीं रहे वे…मिटा दिया होगा हवायों ने सारे सबूत…अब उन गुनाहगारों खातिर सजा की अर्जी कहा तामिल कराऊ…किससे दरख्वास करूँ मेरी जिल्लतों भरी ज़िन्दगी को सवारने की…!!!

निशाँ खत्म हो गए अब..
यहाँ के बाद…!!!

चप्पल तो हैं मिट्टी सने
और तेरा अक्स भी हैं…
पर निशाँ गायब…!!!

ए आसमां तेरी खैर नहीं…
तूने ही निगला होगा…!!!

लौटा दे ला तुर्रंत…
वरना नोच लूँगा
तेरा चमकीला बटन…!!!

सांझ आने से पहले…
ही बिखर जाएंगे तेरे गौहर…!!!

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यादों की अंगीठी….

आँखें कोरी थी और कोई बसता गया..
बिछड़े ऐसे की मन मसोसता रहा..!!

फटे ख्वाब की लुगदिया भरी जेबों में..
कोई संजोता गया मैं बिखेरता रहा..!!

जो सबपे बोझ था कहीं छूट गया..
रात निकलती गयी दिन ढलता रहा..!!

कोई और असर था प्यार के साथ भी..
वादे गिनते रहे सफ़र कटता रहा..!!

अँधेरी रात में डाकू दिखे आते..
जुगनू सोये रहे घर लुटता रहा..!!

बचा ना कुछ जली यादों के सिवा..
अंगीठी तपती रही वक़्त सेंकता रहा..!!

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