वक़्त

तुम अगर वक़्त दो तो बात भी हो जाए,
तेरी दस्तखत लगी सौगात भी हो जाए।

तेज़ रोशनी में काम करती शहरी गलियां,
यहां से आगे बढ़ो तो देहात भी हो जाए।

चल खोजे सपने बादलों के परदों में,
सूरज बाहें खोले तो बरसात भी हो जाए।

मुख़्तसर ही सही पर देखो ज़रा मुझको,
कबकी रुकी हुई मुलाकात भी हो जाए।

©खामोशियाँ-2017 | मिश्रा राहुल
(11-सितंबर-2017)(डायरी के पन्नो से)

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