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याद

बनके याद तुझसे अपने ख्वाबों में मिलता रहूँ,
चाँद को बनाकर आईना मैं हर रोज सजता रहूँ।

अजीब सुकून दे जाती तेरी तबस्सुम संदली सी,
लेकर तेरी ये मोहोब्बत मैं हर रोज़ महकता रहूँ।

लकीरें उलझी सी है उसका ज़िक्र तक ना करना,
कब तलक नजूमी से मैं हर रोज झगड़ता रहूँ ।

– मिश्रा राहुल

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