fbpx

ज़िंदगी का शतरंज


मोहरे सजे-धजे….
पाँव मे जूते पहने तैयार खड़े….

घोड़ा टूटे पैर….
ढाई-पग चलता….
ऊंट तिरछी….
आँखेँ मारता रहता….!!!

वज़ीर लक़वा खाए…
हथियार नहीं उठाता….
हाथी कान कटवाए…
घमंडी हो चुका अब….!!!

ज़िंदगी की विसात….
अब शतरंज से ज़्यादा उलझ गयी….!!!

©खामोशियाँ-२०१४

Share

You may also like...

2 Responses

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति…!

    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (25-01-2014) को "क़दमों के निशां" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1503 में "अद्यतन लिंक" पर भी है!

    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।

    शुभकामनाओं के साथ।
    सादर…!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

  2. ज़िंदगी की विसात….
    अब शतरंज से ज़्यादा उलझ गयी….
    सही बात।
    सुन्दर रचना।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *