fbpx

ज़िंदगी की गाड़ी

प्रेम….लगाव…स्नेह….

तीनों पर्यायवाची है एक दूसरे से लगाव स्नेह उत्पन्न करता जिससे प्रेम बढ़ता जाता। प्रेम ना तो खरीदा जा सकता ना ही जबर्दस्ती किसी से करवाया जा सकता। वो तो स्वमेव हो जाता। अचरज होता कभी-कभी दुनियादारी की दो-धारी व्यवहार को देखकर।

दुनिया चलती ही प्रेम की गाड़ी पर है जिसके चार पहिये होते।
1. पहला भरोसा – भरोसा वो पहिया है किसी गाड़ी जिसका स्टेप्नी नहीं होता क्यूंकी उसका रिप्लेसमेंट नहीं होता।
2. दूसरा उम्मीद – उम्मीद के बिना प्रेम की गाड़ी खिसक ही नहीं सकती। बस ठहर सी जाती है।
3. तीसरा समर्पण – समर्पण होना चाहिए। समर्पण पूरक चक्का है। दोनों बिना असंभव कड़ी।
4. चौथा और अंतिम है स्नेह – स्नेह पर ही पूरी दुनिया टिकी है। स्नेह वो शब्द है जो समेत लेता असंख्य शब्दों व्यवहारों को।

कुछ बातें जादुई होती है। जिसका प्रत्यक्ष रूप से देख पाना असंभव है पर आभासी होने के बावजूद ये बहुत ज्यादा प्रभावित कर जाती। इंसान को।

सोचिएगा जरा।

– मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

Share

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *